मेवाड़। आपने देवी मंदिरों में अखंड ज्योत जलते देखी होगी। मगर क्या आपने यह जाना है कि साक्षा्त देवी ही आग अपने तन पर लपेट लेती हो। ऐसा ही एक चमत्कार होता दिखाई देता है मेवाड़ के सबसे प्रमुख शक्तिपीठों में से एक ईडाणा माता मंदिर में। देश भर में तरह-तरह के मंदिर हैं। हर मंदिर की अपनी अलग कहानी है। मेवाड़ का ईडाणा देवी मंदिर की कहानी बहुत अनूठी है। यहां देवी प्रतिमा स्वयं अग्निस्नान करती हैं।

उदयपुर शहर से 60 किमी दूर कुराबड- बम्बोरा मार्ग पर अरावली की विस्तृत पहाड़ियों के बीच स्थित है मेवाड़ का प्रमुख शक्तिपीठ वास्तव में ईडाणा माता जी का मंदिर है। ईडाणा माता राजपूत समुदाय, भील आदिवासी समुदाय सहित संपूर्ण मेवाड़ की आराध्य मां है ।

यहां देवी की प्रतिमा माह में दो से तीन बार स्वतः जागृत अग्नि से स्नान करती है। इस अग्नि स्नान से देवी को चढ़ाई गई चुनरियां, धागे आदि भस्म हो जाते हैं। कहा जाता है कि इसी अग्नि स्नान के कारण यहां मां का मंदिर नहीं बन पाया। मान्यता है कि वर्षो पूर्व यहां कोई तपस्वी बाबा तपस्या किया करते थे।

बाद में धीरे-धीरे पड़ोसी गांव के लोग यहां आने लगे। जिनकी मन्नत पूरी होती चली गई। इस मंदिर में मां की प्रतिमा के पीछे अगणित त्रिशूल लगे हुए है। श्रद्धालु यहां अपनी मन्नात पूर्ण होने पर त्रिशूल चढ़ाने आते है। साथ ही संतान की मन्नात रखने वाले दम्पत्तियों द्वारा पुत्र रत्न प्राप्ति पर यहां झूला चढ़ाने की भी परम्परा है।

मान्यता के अनुसार ईडाणा माता पर अधिक भार होने पर माता स्वयं ज्वालादेवी का रूप धारण कर लेती हैं। इस दौरान स्थानक पर अचानक आग धधकने लगती है। देखते ही देखते अग्नि विकराल रूप धारण कर 10 से 20फीट तक लपटें पहुंच जाती है मगर श्रृंगार के अन्य सामग्री को कोई आंच तक नहीं आती है। यहां आने वाले इस चमत्कार को देखकर दंग रह जाते हैं।