मल्टीमीडिया डेस्क। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया यानि 14 जुलाई 2018 (शनिवार) को रथ यात्रा शुरू हो रही है। रथ यात्रा मुख्य रूप से भगवान जगन्नाथ की होती है। जिसमें जगन्नाथ का 45 फीट ऊंचा रथ होती है। यह त्योहार पूरे 9 दिन तक जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इन दिनों भगवान जगन्नाथ का गुणगान किया जाता है। जो लोग रथ खींचने में सहयोग करते हैं उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

हिंदू धर्म में जगन्नाथपुरी का वर्णन स्कन्द पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में कई जगह किया गया है। जिसमें बताया गया है कि कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि के बीच विशाल रथों को सैकड़ों लोग मोटे-मोटे रस्सों से खींचते हैं।

सबसे पहले भाई बलराम जी का रथ प्रस्थान करता है। इसके थोड़ी देर बाद बहन सुभद्रा जी का रथ चलना शुरू होता है। अंत में लोग जगन्नाथ जी के रथ को बड़े ही श्रद्धापूर्वक खींचते हैं। माना जाता है कि जो लोग इस दौरान एक दूसरे को सहयोग देते हुए रथ खींचते हैं उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, व सुभद्रा के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि ये लकड़ी हल्की होती है। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है। इसके अलावा यह रथ बाकी रथों की तुलना में भी आकार में बड़ा होता है।

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भगवान जगन्नाथ के रथ के घोड़ों का रंग सफेद, सुभद्रा के रथ के घोड़ों का रंग कॉफी व बलरामजी के रथ के घोड़ों का रंग नीला होता है। भगवान जगन्नाथ देव की रथ यात्रा के दिन बारिश जरूर होती है।

आज तक कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि इस दिन बारिश न हुई हो। माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ रस्ते में एक बार अपना पसंदीदा मिठाई पोड़ा पीठा खाने के लिए जरूर रुकते हैं।

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