वैदिक काल में स्त्रियों का पर्याप्त सम्मान होता था। बालिकाओं के लिए भी उपनयन की व्यवस्था थी। ऋग्वेद की बहुत सी ऋचाओं की रचियता स्त्रियां ही मानी जाती हैं। इस काल की प्रमुख विदूषी महिलाओं में ऊर्वशी, अपाला, विश्वतारा का नाम सम्मान पूर्वक लिया जाता है।

महर्षि याज्ञवल्लय की पत्नी मैत्रेयी परम विदूषी स्त्री थीं । महाभारत की एक पौराणिक पात्र कुंती के बारे में कहा जाता है कि वे अर्थववेद की प्रकाण्ड विद्वान थीं। रामायण में अत्रेयी की कथा में उल्लेख है जो वाल्मीकि तथा अगस्त मुनि के आश्रम में लव और कुश के साथ वेदान्त का अध्ययन करती थीं।

विद्वानों का मानना है कि प्राचीन भारत में महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा हासिल था। हालांकि कुछ अन्य विद्वानों का नजरिया इसके विपरीत है। पतंजलि और कात्यायन जैसे प्राचीन भारतीय व्याकरणविदों का कहना है कि प्रारम्भिक वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा दी जाती थी।

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ऋग्वेदिक ऋचाएं बताती हैं कि महिलाओं की शादी एक परिपक्व उम्र में होती थी और संभवतः उन्हें अपना पति चुनने की भी आजादी थी। ऋग्वेद और उपनिषद जैसे ग्रंथ कई महिला साध्वियों और संतों के बारे में बताते हैं जिनमें गार्गी और मैत्रेयी के नाम उल्लेखनीय हैं।

अध्ययनों के अनुसार प्रारंभिक वैदिक काल में महिलाओं को बराबरी का दर्जा और अधिकार मिलता था। हालांकि बाद में (लगभग 500 ईसा पूर्व में) स्मृतियों (विशेषकर मनुस्मृति) के साथ महिलाओं की स्थिति में गिरावट आनी शुरु हो गयी और बाबर एवं मुगल साम्राज्य के इस्लामी आक्रमण के साथ और इसके बाद ईसाइयत ने महिलाओं की आजादी और अधिकारों को सीमित कर दिया।

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बौद्ध धर्म में महिलाओं को शास्त्रीय शिक्षा के अतिरिक्त औद्योगिक और व्यावसायिक शिक्षा भी दी जाती थी। बौद्द धर्म में स्त्रियों को त्याज्य समझा जाता था। वैदिक शिक्षा के अंतर्गत स्त्रियों को जो उपनयन संस्कार की व्यवस्था थी जो लगभग समाप्त हो गई। फिर भी गौतम बुद्ध ने स्त्रियों को बिहारों और मठों में रहने की आज्ञा दी थी।

जैन धर्म जैसे सुधारवादी आंदोलनों में महिलाओं को धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने की अनुमति दी गई है, भारत में महिलाओं को कमोबेश दासता और बंदिशों का ही सामना करना पडा है।