- देवदत्त पटनायक

जब मैं कथाएं सुनता हूं कि गणेश ने किस तरह लेखक की भूमिका निभाई और व्यास द्वारा सुनाई गई महाभारत का लेखन किया, या हनुमान ने पत्तियों पर रामायण लिखी, या पत्थरों पर राम नाम लिखा ताकि लंका जाने के लिए सेतु बनाया जा सके, मैं आश्चर्य करता हूं कि उन्होंने किस लिपि का उपयोग किया होगा?

हम अक्सर भूल जाते हैं कि एक लिपि भाषण से अलग होती है। लिपि से तात्पर्य भाषा के लिखे स्वरूप है जबकि भाषण का अर्थ है बोले गए शब्द। चीनी लिपि 5000 वर्षों से ज्यादा प्राचीन है।

मेसोपोटामिया में 4000 वर्ष पूर्व क्यूनीफॉर्म लिपि प्रचलित थी। लेकिन निकटतम ज्ञात भारतीय लिपि ब्राह्मी के बारे में जानकारी 2300 वर्षों पूर्व अशोक के शासन में लगे शिलालेखों से प्राप्त होती है। क्या भारतीय उसके पहले भी लेखन करते थे? हम निश्चय के साथ नहीं कह सकते।

सिंधु घाटी प्रतीकों और अशोक शासन के बीच 1500 वर्षों से ज्यादा का अंतराल है जिसमें कोई लिपि प्राप्त नहीं होती। जबकि हमारी प्रसन्नता बढ़ाने वाले संकेत कहते हैं कि वैदिक ऋषियों ने आकाश में सितारों को मिलाकर अक्षरों की रचना की, हालांकि यह अटकल ही रही।

कुछ लोग मानते हैं कि ब्राह्मी खरोष्ठी से ही उद्भूत हुई है जो कि मध्य एशिया के इंडो-ग्रीक राजाओं द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली अरेमेइक से आई। लेकिन यह सिद्ध नहीं हुआ है। या, संभवत, मौर्य राजाओं के आदेश पर इसकी रचना कृत्रिम तरीके से की गई ताकि वे शासक के तौर पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकें। कोई भी सुनिश्चित तौर पर नहीं कह सकता। ब्राह्मी लिपि ने ही आखिरकर भारत में सभी भाषा लिपियों को जन्म दिया।

जैन पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि सभ्यता को मानवता तक लाने वाले पहले तीर्थंकर ऋषभदेव की एक बेटी थी जिसका नाम ब्राह्मी था और कहा जाता है कि उसी ने लेखन की खोज की। यही कारण है कि उसे ज्ञान की देवी सरस्वती के साथ जोड़ते हैं। हिन्दू धर्म में, सरस्वती को शारदा भी कहा जाता है जो ब्राह्मी से उद्भूत उस लिपि से संबंधित है जो करीब 1500 वर्ष पुरानी है।

बुद्ध धर्म के अनुयायियों ने विभिन्ना प्राकृत भाषा में बुद्ध के विचारों को लिपिबद्ध करने के लिए ब्राह्मी लिपि का ही उपयोग किया। ब्राह्मण संवाद के इस नए माध्यम के प्रति आशंकित थे और उन्होंने खासतौर पर मौखिक संवाद को ही बेहतर माना और करीब 100 ई तक लिखित स्वरूप अपनाने से दूर रहे।

यही कारण है कि क्यों भारत का अधिकांश लेखन ईपू 400 से 400 ई के बीच है, जबकि लेखन को अपनाया जाने लगा था। इस समयावधि में किया गया बहुत सा लेखन संभवत मौखिक रूप से दशकों पहले ही व्यक्त हो चुका था।

जब मैं कथाएं सुनता हूं कि गणेश ने किस तरह लेखक की भूमिका निभाई और व्यास द्वारा सुनाई गई महाभारत का लेखन किया या हनुमान ने पत्तियों पर रामायण लिखी, या पत्थरों पर राम नाम लिखा ताकि लंका जाने के लिए सेतु बनाया जा सके, मैं आश्चर्य करता हूं कि उन्होंने किस लिपि का उपयोग किया होगा?

या क्या ये कथाएं भारतीय उपमहाद्वीप में लिपि आने के बाद सामने आईं? दूसरे शब्दों में, क्या ये कथाएं मौर्यों के बाद के काल में सामने आईं?

पहले राजा के दरबार में भी लेखन पर प्रतिबंध था और ताम्र पत्रों, शिला लेखों के साथ ताड़ पत्र पर पांडुलिपि बनती थी। बाद में इसे जैन और बौद्ध भिक्षुओं ने लोकप्रिय बनाया जिन्होंने पवित्र ग्रंथों की प्रतिकृति में अपना बहुत सारा समय खर्च किया।

लिखे शब्दों की लोकप्रियता का बहुत श्रेय 100 ई. में चीन में हुए कागज के आविष्कार को भी जाता है। यह इस्लाम के फैलने के साथ दुनिया के अन्य हिस्से में भी गया।

मुस्लिम जहां भी गए वे अपने साथ कागज को ले गए। कुरान में जिक्र है,अल्लाह पैगम्बर मुहम्मद को पढ़ने के लिए कहते हैं और इस तरह सेमीटिक परंपरा (निकट पूर्व और उत्तर पूर्व अफ्रीका) में बोले गए शब्दों पर लिखे शब्द की अहमियत बताते हैं। इसलिए पवित्र पुस्तक की प्रतिकृति करना महत्वपूर्ण माना गया।

मुस्लिमों द्वारा पुस्तक को महत्व देने से भारत पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा। 10 वीं शताब्दी के बाद से हम न केवल भगवद् गीता और रामायण जैसी हिन्दू पुस्तकों की लोकप्रियता ही पाते हैं बल्कि बहुत सी क्षेत्रीय लिपियों जैसे तमिल, ओड़िया, बंगाली और निश्चित रूप से देवनागरी को भी उभरता हुआ पाते हैं।

पुस्तकों का धन्यवाद व्यक्त करना चाहिए क्योंकि हमें स्त्रोत और गीतों को इतने लंबे समय तक याद रखने की जरूरत नहीं रही। हमें केवल लाइब्रेरी तक जाना था और पुस्तकों के पन्नो भर पलटना थे।

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