मनुस्मृति में राजा के राजधर्म के विषय में कई गुण बताए गए हैं, जैसे कि राजा के बिना इस लोक में चारों ओर भय का वातावरण रहता है और उसके कारण व्याकुलता फैलती है। इसलिए सभी की रक्षा के लिए परमात्मा ने राजा का पद बनाया है।

इंद्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चंद्रमा और कुबेर के सभी सारभूत गुणों को निकाल कर इनकी स्वाभाविक मात्राओं यानी अंशों का सार लेकर इन दिव्य गुणों से राजा का निर्माण किया।

राजा के लिए सृष्टि के आरंभ में ही ईश्वर ने सभी प्राणियों की रक्षा करने वाले ब्रह्मतेजोमय, शिक्षाप्रद और अपराधनाशक गुण वाला होना चाहिए। मनुस्मृति वैसे तो कई गुणों के बारे में बताया गया है पर उनमें से मुख्य गुण...

राजा का राजधर्म

  • कोई भी व्यक्ति राजा या राजसभा का सभासद तब ही बन सकता है जब वह तीनों विद्याओं का ज्ञाता हो, यानी चारों वेद, कर्म, उपासना और ज्ञान का पंडित हो। तीनों विद्या, सनातन, दंडनीति, न्यायप्रिय और प्रजा से बात करने की कला आदि गुणों में पारंगत होना चाहिए। वही व्यक्ति सभासद या राजा बनने योग्य है।
  • कार्य शक्ति, देश और काल को ठीक प्रकार से समझ कर धर्म की सिद्धि के लिए राजा बार-बार कई तरह के आचरण करता है। वह कभी क्षमा करता है तो कभी गुस्सा दर्शाता है, तो फिर कभी भावुक हो जाता है। यही नियति है।
  • जिसके प्रसन्न होने पर प्रजा में लक्ष्मी बरसती है, प्रजा के पराक्रम में जय और श्री प्राप्त होती है। जिसके क्रोध से मानो साक्षात् मृत्यु ही निवास करती है ऐसा राजा सर्व तेजोमय कहा गया है। अतः उसके साथ वैसा ही बर्ताब करना चाहिए।
  • जो दण्ड भली प्रकार से सोच विचार कर धारण किया जाता है वही दण्ड सारी प्रजा का रक्षक भी है। वहीं दण्ड सोती हुई प्रजा को जगाता रहता है। इसलिए बुद्धिमान लोगो ने दंड को ही धर्म कहा है।
  • जो राजा भली प्रकार दंड का संचालन करता है वह धर्म, अर्थ, काम की सिद्धि को बढ़ाता है और जो विषय में ईर्ष्या करने वाला, क्षुद्र, नीच बुद्धि न्यायाधीश राजा होता है, वह उसी दंड से मारा जाता है।जो राजा उत्तम सहायकों से शून्य है, मूढ़ , लोभी जिसने उत्तम कर्मों तथा विद्या और बुद्धि की उन्नति नहीं की है, जो विषयों में फंसा हुआ है उससे वह दंड न्यायपूर्वक नहीं चल सकता है।
  • राजा अगर सत्य आचरण करने वाला, जिसके साथी सभी श्रेष्ठ पुरुष हैं, जो स्वयं बुद्धिमान है वही इस न्याय रूपी दंड को चलाने में समर्थ है।
  • राजा को अपने राज्य में न्यायकारी और शत्रुओं को सदा दंड देने वाला और प्रिय मित्रों से कुटिलता रहित और ब्रह्मणों पर क्षमायुक्त होना चाहिए।
  • जो राजा इसके विपरीत चलता है, जो विषयसक्त है उसका यश संसार में उसी प्रकार संकुचित हो जाता है जिस प्रकार पानी में पड़ी घृत की बूंद संकुचित हो जाती है।
  • राजा कितना ही विद्वान क्यों न हो, उसको चाहिए कि वहर इस प्रकार के विद्वान ब्रह्मणों से नित्य शिक्षा ग्रहण करे। जो राजा इस प्रकार नित्य सिक्षा ग्रहण करता है वह कभी अनियमित काम नहीं करेगा और इस प्रकार उसका कभी नाश भी नहीं होगा।