नोएडा। जाने-अनजाने में जो गलतियां हुई हैं, कभी किसी का दिल दुखा हो, कोई बात बुरी लगी हो या कोई रूठ गया हो तो आज भी नोएडा व ग्रेटर नोएडा के ग्रामीण इलाकों में रूठों को मनाने की परंपरा चली आ रही है। मकर संक्रांति के दिन इस परंपरा को निभाया जाता है। महाराष्ट्र में भी यही परंपरा है।

यह परंपरा जितनी पुरानी है, उतनी ही दिलचस्प भी है। मकर संक्रांति के दिन घर का कोई भी बुजुर्ग या बड़ा व्यक्ति ऐसा व्यवहार करने लगता है, जैसे उसे कोई बात बहुत बुरी लग गई हो। वह यह भी नहीं बताता कि बात क्या है? इतना ही नहीं वह रूठकर पड़ोस में किसी घर में जाकर बैठ जाता है।

इसके बाद शुरू होता है रूठे को मनाने का सिलसिला। इसके लिए महिलाएं गीत गाते हुए समूह में जाती हैं और मान-मनौव्वल कर घर लेकर आती हैं। कई बार परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कुछ मिनटों में ही मान-मनौव्वल हो जाती है, जबकि कुछ जगह रूठों को मनाने का कार्यक्रम कई घंटे तक चलता है।

रूठे को मनाने के लिए कपड़े दिए जाते हैं या मिठाई आदि देकर मनाया जाता है। रूठा व्यक्ति जब घर जाने को तैयार हो जाता है तो जो व्यक्ति उसे मनाने में सबसे आगे होता है, उसे भी शगुन के रूप में कुछ रुपए (नेग) भी दिए जाते हैं।

पीढि़यों से चली आ रही परंपरा

नोएडा के ग्रामीण इलाकों में मकर संक्रांति के दिन निभाई जाने वाली यह परंपरा काफी पुरानी है। हालांकि कोई नहीं जानता कि यह परंपरा कब और कैसे शुरू हुई, लेकिन पीढि़यों से इस परंपरा को लोग निभाते आ रहे हैं। आज भी इसे निभाने के लिए कई दिन पहले से तैयारी होती है। किसी भी घर में जब भी कोई विवाह होता है तो नव दंपति इस परंपरा को जरूर निभाते है।

माफी व गलतियों की सजा मांगी जाती है

इस परंपरा का उद्देश्य घर को मजबूत रस्सी की तरह एकजुट रखना है। इस दिन घर का सबसे छोटा दंपति बड़ों से या घर के बुजुर्ग से माफी मांगता है कि जाने-अनजाने अगर कोई गलती हुई है तो उसे माफ किया जाए। इसके लिए बुजुर्गो को बच्चों की तरह मनाया जाता है और उन्हें खुश करने के लिए उनकी पसंदीदा चीज खाने और पहनने के लिए दी जाती है।

मकर-संक्रांति पर्व से बढ़ता से मेलजोल

समाजशास्त्री डॉ. संतराम देशवाल कहते है कि मकर-संक्रांति जैसे पर्व आज के दौर में भी युवाओं को पुरानी परम्पराओं से जोड़कर रखते हैं। यह पर्व हमे अपने बुजुर्गो का सम्मान करना सिखाता है। युवाओं को चाहिए कि इस तरह के पर्व के बारे में बारीकी से जानकारी रखे। पुरानी परम्पराएं सामाजिक बुराइयों से लड़ने में काफी सहायक होती है। इस तरह के पर्व से आपसी मेलजोल व भाईचारा बढ़ता है।