मल्टीमीडिया डेस्क। 'ब्रह्मभोज का नाम सुनकर तू यहां चला आया, तू जानता नहीं की मुफ्त भोजन करना महापाप है? इसके लिए तुझे कुछ न कुछ सेवा करना चाहिए। आ, मै तुझे कुछ काम देता हूं। देख वहां कुछ वेदज्ञ ब्राह्मण बैठे हुए हैं उनके लिए चंदन घिस दे,' मठाधीश ने एक और बैठे ब्राह्मण से कुछ कड़े शब्दों में कहा। वह ब्राह्मण निर्धन प्रतीत हो रहा था, मठाधीश के शब्द उसको तीर की भांति चुभे।

खिन्न मन से उसने चंदन घिसना शुरू किया। चंदन घिसते-घिसते मन का ताप शमन करने लिए रामनाम का जाप करने लगा, लेकिन उसके बावजूद उसके मन का ताप शांत नही हुआ तो वह अग्निसूक्त का जाप करने लगा। लगभग एक घंटे में चंदन तैयार हुआ और परिचारक उसको लेकर चला गया।

युवक वहीं बैठा अग्निसूक्त का जाप करता रहा। वेदज्ञ ब्राह्मणों ने जब चंदन का लेप अपने मस्तक पर किया तो वह अग्निदाह से तड़फ उठे। सैकड़ों ब्राह्मणों को अग्निदाह से छटपटाते देख ग्रामवासी और गांव के मुखिया चिंतित हो उठे।

बात मठाधीश के ध्यान में आई तो उसने तुरंत युवक के पास जाकर करबद्ध होकर कहा कि मान्यवर मुझसे अपराध हो गया। कृपया क्षमा करें। मैने आपको अकारण कष्ट दिया। कृपया अग्निदहन से अभिमंत्रित मंत्रों का त्राण करें। युवक को जब इस बात का ज्ञान हुआ तो उसने अग्निसूक्त के स्थान पर वरुणसूक्त का पाठ प्रारंभ कर दिया।

मंत्रजाप प्रारंभ करने के साथ ही वेदज्ञ ब्राह्मणों के मस्तक पर लगा चंदन शीतलता प्रदान करने लगा। कृतार्थ होकर मठाधीश ने युवक की चरणवंदना की और। उसके बाद ग्रामप्रमुख ने युवक की जानकारी लेकर उसके और उसके परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था की। यह युवक आगे चलकर राघवेन्द्राचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ।