लोहड़ी शब्द 'लोही' से बना जिसका अभिप्राय है वर्षा होना, फसलों का फूटना। मान्यता है कि अगर लोहड़ी के समय वर्षा न हो तो कृषि का नुकसान होता है।

यह त्योहार मौसम में परिवर्तन, फसलों का बढ़ने तथा कई ऐतिहासिक तथा दंत कथाओं से जुड़ा हुआ है। लोहड़ी माघ महीने की संक्रांति से पहली रात को मनाई जाती है।

किसान सर्द ऋतु की फसलें बोकर आराम फरमाता है, जिस घर में लड़का पैदा हुआ हो वहां से शगुन एवं लोहड़ी पाई जाती है।

इस दिन प्रत्येक घर में मूंगफली, रेवडि़यां, चिवड़े, गजक, भुग्गा, तिलचौली, मक्के के भुने दाने, गुड़, फल आदि लोहड़ी बांटने के लिए रखे जाते हैं।

गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है। दही के साथ इसका स्वाद अपना ही होता है। जिस नवजात बच्चे के लिए लोहड़ी मनाई जाती है उसके रिश्तेदार उसके लिए सुंदर वस्र, खिलौने तथा जेवरात आदि बनवा कर लाते हैं।

इस त्योहार के साथ जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध डाकू, दूल्ला भट्टी ने एक निर्धन ब्राह्मण की दो बेटियों सुंदरी एवं मुंदरी को जालिमों से छुड़ाकर उनकी शादियां कीं तथा उनकी झोली में शक्कर डाली। उन निर्धन बेटियों की शादियां करके पिता के फर्ज निभाए।

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माघ माह को शुभ समझा जाता है। इस माह में विवाह शुभ माने जाते हैं। इसी माह में पुण्य दान करना, खास करके लड़कियों की शादी करना शुभ माना जाता है।