योगेंद्र शर्मा। कहते हैं रिश्ते स्वर्ग में बनते हैं। और धरती पर उनको हकीकत में तब्दील किया जाता है। दुनिया में पति-पत्नी से लेकर भाई-बहन, माता- पिता और यार -दोस्त तक के रिश्ते होते हैं, जो समय-समय पर आपकी जिंदगी में बहुत मायने रखते हैं। ऐसा ही एक अनमोल दिल को छू जाने वाला रिश्ता प्यार, मोहब्बत या इश्क का होता है, जो धीरे-धीरे आपकी जिंदगी में दस्तक देकर जल्द ही परवान चढ़ जाता है। दो दिलों की धड़कन के बीच का यह रिश्ता भी आपके जन्म के साथ ही ग्रह, नक्षत्र और योग से बन जाता है और किशोरावस्था की दहलीज पर पहुंचने के साथ इस रिश्ते की शुरुआत हो जाती है।

आइए जानते हैं मानव जीवन की कुंडली की उन दशाओं के संबंध में जब यह रिश्ता बनता है और धीरे-धीरे न टूटने वाले सात जन्मों के संबंध में बदल जाता है।

ग्रहदशा से निर्धारित होते हैं प्यारभरे रिश्ते

किसी इंसान की कुंडली की ग्रहदशा उसके प्यार के रिश्ते की हकीकत को बयां कर देती है। शुक्र ग्रह प्यारभरे रिश्तों का कारक होता है। ज्योतिषशास्त्र में शुक्र को स्त्रीग्रह माना गया है। शुक्र ग्रह प्रेमी-प्रेमिका, प्रेम संबंध, भोग विलास, पति-पत्नी के साथ ग्लैमर वाले जॉब जैसे फिल्मी दुनिया, मॉडलिंग के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। कुंडली में शुक्र की दशा बेहतर होने से ही प्यार के रिश्ते की शुरूआत होकर जीवन में खुशियां आती है।

प्यारभरे रिश्तों की यह मिठास उस वक्त और प्रगाड़ हो जाती है जब शुक्र के साथ चंद्र और मंगल का बेहतर तालमेल हो जाता है। शुक्र को आकर्षण, सौंदर्य और विलासिता का कारक माना गया है तो मंगल को उत्साह और उत्तेजना का कारक माना जाता है।

ज्योतिष के विद्वानों का इस संबंध में कहना है कि प्रेम संबंध की सफलता को देखने के लिए पुरुष की कुंडली में शुक्र और स्त्री की कुंडली में मंगल को देखा जाता है। लेकिन मंगल चूंकि साहस का प्रतीक है इसलिए पुरुष की कुंडली में शुभ मंगल प्रेम में साहस की अभियक्ति करता है और साथ ही वह धैर्यवान भी होगा। जब व्यक्ति की कुंडली में शुक्र का किसी तरह से मंगल से शुभ योग बन जाए तो प्यार में सफलता के योग कई गुना बढ़ जाते हैं।

कुंडली के पंचम भाव है प्रेम का भाव

कुंडली के 12 भावों में से पांचवां भाव प्रेम की अभिव्यक्ति करता है। इस भाव का स्वामी ग्रह यदि प्रबल हो तो जिस भाव में स्थित होता है, उसका प्रेम जातक को अवश्य मिलता है। पंचम और सप्तम भाव को स्वामी यदि एक साथ आ जाएं तो यह स्थिति भी प्रेम जीवन के लिए सकारात्मक योग बनाती है और व्यक्ति अपने प्यार को पा लेता है। यदि शुक्र की दृष्टि पंचम पर पड़ रही हो या शुक्र चंद्रमा को देख रहा हो तो प्यार चुपके-चुपके अपनी मंजिल तक बढ़ता चला जाता है।

शुक्र ग्रह को माना जाता है प्रेम का कारक

ज्योतिषशास्त्र में शुक्र ग्रह को प्रेम का कारक माना गया है । कुण्डली में लग्न, पंचम, सप्तम तथा एकादश भावों से शुक्र का सम्बन्ध होने पर व्यक्ति प्रेमी स्वभाव का होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचम भाव प्रेम का भाव होता है और सप्तम भाव विवाह का। पंचम भाव का सम्बन्ध जब सप्तम भाव से होता है तब दो प्रेमी वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। नवम भाव से पंचम का शुभ सम्बन्ध होने पर भी दो प्रेमी पति पत्नी बनकर दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त करते हैं।