मल्टीमीडिया डेस्क। कहा जाता है कि भगवान सिर्फ भावों के भूखे होते हैं और शास्त्रों में कहा गया है कि जो भी पत्र, पुष्प मानव तुझको प्रिय है वह मुझे समर्पित कर, वह मैं स्वीकार करूंगा। श्रद्धा से समर्पित किया गया भोग भगवान स्वीकार करते हैं और मानव को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। वनवास के समय द्रौपदी ने एकमात्र चावल के दाने से श्रीकृष्ण को भोग लगाया था और महर्षि दुर्वासा की भूख को भी शांत किया था। शास्त्रों में कहा गया है कि

त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पये।

ग्रहण सुमुखी भूत्वा प्रसीद परमेश्वर।।

प्रसाद को महाप्रसाद और महाभोग भी कहा जाता हैा देवी-देवताओं को विभिन्न तरह के प्रसाद समर्पित करने का विधान है। इसमें पत्ते, फूल, अनाज और मिष्ठान्न को प्रभु की सेवा में अर्पित किया जाता है।

प्रथम पूज्य श्रीगणेश को मोदक और लड्डूओं का भोग लगाने का विधान बताया गया है। मान्यता है कि मोदक और लड्डू का भोग श्रीगणेश को लगाने से उनका आर्शीवाद भक्त को मिलता है और मुराद पूरी होती है। इसके साथ दुर्वा घास भी गणेशजी को चढ़ाई जाती है।

हनुमानजी को बूंदी के लड्डू, गुड़-चना, चना-शकर की चिरौंजी और श्रीफल चढ़ाने की परंपरा है।

लक्ष्मीजी को खील, बताशे, बर्फी, सिंघाड़े, अनार और विभिन्न मिष्ठान्न चढ़ाने का विधान बताया गया है।

शिवजी को वैसे तो सफेद मिठाई का भोग लगाया जाता है, लेकिन वनवासी शिव को भांग, धतूरा प्रसाद रूप में चढ़ाया जाता है।

माता बगलामुखी को शत्रुनाश और सर्वमनोकामना सिद्धी की देवी माना जाता है। इनको पीले मिष्ठान्न और फल अर्पित करने का विधान है।

श्रीकृष्ण को छप्पनभोग और तुलसी दल समर्पित किए जाते हैं।

शनि महाराज की कृपा पाने के लिए काले तिल, काले उड़द और उड़द से बने पकवानों का भोग लगाया जाता है।