- पण्डित विनोद चौबे, ज्योतिषाचार्य

मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र की राशि या पुत्र के घर एक माह के लिए निवास करने जाते हैं। जिस तरह चंद्रमा की गति से पथ भ्रमण से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का निर्णय होता है, ठीक उसी प्रकार से आदि देव भास्कर मकर रेखा के दक्षिण भाग से उत्तर की ओर प्रवेश करते हैं।

मकर संक्रांति के दिन से ही सूर्य नारायण का प्रकाश पृथ्वी के इस भूभाग पर तिल-तिल भरता चला जाता है। 6 महीने तक भगवान सूर्य उत्तरायण रहेंगे। सूर्य उत्तरायण के 6 महीने देवताओं के दिन और कर्क राशि से 6 महीने नेताओं की रात्रि मानी जाती है।

मकर संक्रांति का पौराणिक महत्त्व

भीष्म पितामह ने अपनी काया के परित्याग का दिन चुना था। इस दिन भगवती गंगा महर्षि भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर समुद्र में समाहित हुई थीं। मकर संक्रांति से ही प्रकृति करवट लेती है। दिनों का बनना और शुभ कार्यों का प्रारंभ हो जाता है।

पुराणों में महत्व बताया गया है कि मकर संक्रांति को एका त्याग करने वाली आत्माओं को स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त होता है। दक्षिणायन में अंधकार होने से स्वर्ग मार्ग में पहुंचने में समय लगता है।

संक्रांति के प्रवेश के अनंतर की 40 घटी या 16 घंटे पुण्य काल माना जाता है। इसमें भी 20 घटी या 8 घंटे अति उत्तम है। यदि सायं काल में सूर्यास्त से एक घड़ी 24 मिनट पहले प्रवेश हो तो संक्रांति से पूर्व ही स्नान दान सहित संक्रांतिजन्य किये जाने वाले पुण्य सभी कार्य करना चाहिए क्योंकि संक्रांति के दिन रात्रि में भोजन का निषेध है।

और संतान युक्त ग्रहस्थ के लिए उपवास का भी निषेध है। रात्रि में संक्रांति का प्रवेश हो तो दूसरे दिन मध्यान्ह तक स्नान-दानादि किए जा सकते हैं किंतु सूर्योदय से 5 घटी लगभग 2 घंटे अत्यंत पवित्र माना गया है।

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संक्रांति माघ शुक्ल पक्ष में सप्तमी के दिन यदि यह सक्रांति हो तो, यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व शुभदायक संक्रांति मानी जाती है।