शास्त्रों के अनुसार कलयुग के जीवित देवता में एक हनुमान जी भी है। इसलिए रामायण में राम के अनुचर से लेकर महाभारत में अर्जुन के रथ पर विराजे हनुमान का उदाहरण दिया जाता है। हनुमान जी को सबसे जल्दी प्रसन्ना होने वाले देवताओं में गिना जाता है। ठीक यही बात भगवान शिव के लिए भी कही जाती है। हनुमान भगवान शिव के 11वें अवतार कहे जाते हैं। वे परम रामभक्त हैं।

प्रत्येक वर्ष हनुमान जयंती चैत्र माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। हनुमानजी का जन्मदिन साल में दो बार मनाया जाता है। हनुमान जी का पहला जन्मदिन चैत्र पूर्णिमा को और दूसरा कार्तिक माह की चौदस को मनाया जाता है। इस बार 19 अप्रैल को भगवान हनुमान का जन्मदिन मनाया जाएगा। शास्त्रों के मुताबिक, भगवान हनुमान की पूजा करने पर राहु और शनिदोष की पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है।

पौराणिक कथा

शास्त्रों के अनुसार हनुमान जी की माता अंजना एक अप्सरा थीं, उन्होंने श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लिया और इस श्राप से उनकी मुक्ति तभी होती जब वे एक संतान को जन्म देतीं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार केसरी श्री हनुमान जी के पिता थे। वे सुमेरू राज्य के राजा थे और बृहस्पति के पुत्र थे। अंजना ने संतान प्राप्ति के लिए 12 वर्षों तक भगवान शिव की घोर तपस्या की और परिणाम स्वरूप उन्होंने संतान के रूप में हनुमानजी को प्राप्त किया।

एक कथा के अनुसार एक बार उन्हें बड़ी जोर की भूख लगी हुई थी इसलिए वे आकाश में उछले और सूर्य को फल समझ खाने की ओर दौड़े उसी दिन राहू भी सूर्य को अपना ग्रास बनाने के लिए आया हुआ था लेकिन हनुमान जी को देखकर उन्होंने इसे दूसरा राहु समझ लिया। तभी इंद्र ने पवनपुत्र पर वज्र से प्रहार किया जिससे उनकी ठोड़ी पर चोट लगी व उसमें टेढ़ापन आ गया इसी कारण उनका नाम भी हनुमान पड़ा।

हनुमान जी की पूजा में सिन्दूर एवं तेल का महत्व

हनुमानजी की पूजा में सिंदूर और तेल का खासा महत्व है। इस संबंध में एक कथा कथा है कि एक बार माता सीता को हनुमान जी ने सिन्दूर लगाते देखा तो पूछ बैठे - माता ये क्या लगा रही हैं? सीता ने बताया कि - सिंदूर लगाने से श्री राम प्रसन्न होते हैं इसलिए लगा रही हूं।

तब अपने प्रभु श्री राम को प्रसन्ना करने के लिए हनुमान ने अपने पूरे शरीर में सिन्दूर लगा लिया। इसी प्रकार तेल की भी छोटी सी घटना हैं एक बार शनिदेव गन्धमादन पर्वत की तरफ से गुजरे. हनुमान की ध्यानमग्नता को देख कर उन्हें हनुमान से इर्ष्या होने लगी।

शनि का अकारण अहंकार जागा और उन्होंने सोचा नियमानुसार मैं इस वानर के राशि पर आ ही गया हूं। अब दो-चार पटकनी देकर इसकी दुर्दशा का आनन्द भी हाथों-हाथ ले लूं। उन्होंने पवनपुत्र को ललकारा .हनुमान का ध्यान टूटा।

हनुमान ने अपने सामने उपस्थित शनिदेव को पहचान कर उन्हें नमस्कार करते हुए विनित स्वर में कहा - मैं अपने प्रभु श्री राम के ध्यान में लीन हूं, कृपा कर मुझे अपनी अर्चना करने दीजिये।

शनि ने उन्हें कहा - वानरराज मैंने देव-दानव और मनुष्य लोक में हर जगह तुम्हारी प्रशंसा सुनी है। अत: यह कायरता छोड़ निडर होकर मुझसे युद्ध करो। मेरी भुजाएं तुम्हारे बल का परिमापन करने के लिए फड़फड़ा रही हैं। मैं तुम्हें युद्ध के लिए ललकार रहा हूं।

शनि की घृष्टता देखकर, हनुमान ने अपनी पूंछ बढ़ाई और उसमे शनि को बुरी तरह लपेट लिया, ऐसा कसा कि शनि बेबस, असहाय होकर छटपटाने लगे, इतने में रामसेतु की परिक्रमा का समय हो गया, हनुमान जी तेजी से दौड़ते हुए परिक्रमा करने लगे।

पूंछ से बंधे शनि पत्थरों, शिलाखंडों, बड़े-बड़े विशाल वृक्षों से टकराकर लहूलुहान हो गये। व्यथित हो कर पीड़ा से दु:खी शनि पवनपुत्र से बन्धन मुक्त करने की प्रार्थना करने लगे तो हनुमान ने शनि से वचन लिया कि श्री राम की भक्ति में लीन मेरे भक्त को तुम कभी तंग नही करोगे। असह्य वेदना से शनि का अंग-अंग पीड़ित था।

छटपटाते शनि ने हनुमान से तेल मांगा उस दिन मंगलवार था। अत: मंगलवार के दिन जो हनुमान जी को तेल चढ़ाता है वो सीधे शनि को मिलता हैं और शनि प्रसन्ना हो कर भक्त को आशीर्वाद देते है। इस प्रकार तेल और सिन्दूर को मिला कर हनुमान जी को लगाया जाता हैं।