मल्टीमीडिया डेस्क। संक्रांति पर्व सूर्य की आराधना का पर्व है। दिन का प्रारंभ सूर्य की स्वर्णिम रश्मियों के साथ होता है और सूर्य की प्रतिदिन आराधना से मानव की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। सालभर में 12 संक्राति आती है। इन सभी संक्रातियों पर दान- पुण्य और पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है। ऐसा ही खास महत्व मिथुन संक्रांति का है। मिथुन संक्रांति साल के तीसरे महीने में आती है। उस समय सूर्य का तेज धरती पर सबसे ज्यादा होता है।

मिथुन संक्रांति के दिन सूर्य वृषभ राशि से मिथुन राशि में प्रवेश करता है। जिस कारण इसको मिथुन संक्रांति कहा जाता है। ब्रह्माण्ड में होने वाले इस परिवर्तन का राशियों पर भी असर पड़ता है। इससे आगामी एक महीने तक राशियों पर अच्छा, सामान्य और सतर्कता बरतने वाला समय रहता है।

उड़ीसा में इस दिन को राजा परबा पर्व के रूप में मनाया जाता है। राजा परबा उत्सव चार दिनों तक मनाया जाता है। उस पर्व में वर्षा ऋतु के आगमन की खुशियां मनाई जाती है। हर्षोल्लास के साथ इस उत्सव को पारंपरिक लोकगीत गाते हुए मनाया जाता है। राजा परबा पर्व पर लड़कियां बरगद के पेड़ पर झूले डालकर झुला झूलती है और लोकगीत गाती है।

मिथुन संक्रांति के दिन भगवान विष्णु और मां धरती की होती है पूजा

सनातन संस्कृति के अनुसार मिथुन संक्रांति के दिन दान-पुण्य का बहुत महत्व होता है। इस दिन लोग भगवान विष्णु और धरती माँ की आराधना करते है। उड़ीसा में इस दिन एक पाषाण को माता पृथ्वी का स्वरूप मानकर फलों, फूलों, अबीर, गुलाल, कुमकुम, अक्षत, हल्दी, मेंहदी और सुगंधित द्रव्यों से उसकी पूजा की जाती है और इस तरह से वर्षा ऋतु के आगमन की तौयारी के साथ उत्तम वर्षा की कामना की जाती है। इस दिन कपड़ों के दान का विशेष महत्व बताया गया है। साथ ही मिथुन संक्रांति के दिन चावल का सेवन करना निषेध माना गया है।