धर्म डेस्क। मकर संक्रांति के दिन सूर्य के एक राशि से दूसरे राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर जाते हुए माने जाते हैं। मकर संक्रांति से दिन बढ़ने लगता है और रात की अवधि कम होती जाती है। सूर्य ही ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है, इसलिए हिंदू धर्म में मकर संक्रांति मनाने का विशेष महत्व है।

शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं और इस दिन सूर्य देव मकर राशि में आते हैं, लिहाजा यह भी कहा जाता है कि इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं। अतएव इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।

ऐतिहासिक दृष्टि से महत्व-

महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही दिन चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मकर-संक्रांति से प्रकृति भी करवट बदलती है। हमारे वेदों में मकर संक्रांति को महापर्व का दर्जा दिया गया है।

इस त्योहार के हैं कई नाम-

मकर संक्रांति को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाई और दान की जाती है, इसलिए वहां यह पर्व खिचड़ी के नाम से प्रसिद्ध हो गया है। झारखंड और मिथिलांचल के लोगों का मानना है कि मकर संक्रांति से सूर्य का स्वरूप तिल-तिल बढ़ता है, अतः वहां इसे तिल संक्रांति कहा जाता है।

हरियाणा व पंजाब में इसे लोहड़ी, असम में इस दिन बिहू त्योहार और दक्षिण भारत में पोंगल कहते हैं। यहां इस दिन तिल, चावल, दाल की खिचड़ी बनाई जाती है। यह पर्व चार दिन तक चलता है।

स्नान का मान-

कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम यानी प्रयाग में सभी देवी-देवता अपना स्वरूप बदलकर स्नान के लिए आते हैं। इसलिए इस दिन गंगा स्नान करने से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। इसीलिए इस दिन दान, तप, जप का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन को दिया गया दान विशेष फल देने वाला होता है।

तिल का महात्म्य-

संक्रांति के दिन सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसके स्वामी शनिदेव हैं। वह सूर्य पुत्र होते हुए भी शनि उनसे शत्रु भाव रखते हैं। शनिदेव के घर में सूर्य की उपस्थिति के दौरान शनि उन्हें कष्ट न दें, इसलिए मकर संक्रांति पर तिल का दान किया जाता है।