मल्टीमीडिया डेस्क। दिपावली के एक दिन पहले की चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी या नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन उबटन लगाकर स्नान का बड़ा महत्व है साथ ही यह तिथि भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी हुई है।

श्री कृष्‍ण ने किया नरका सुर का वध

कहते हैं कि नरक चतुर्दशी के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष में दीयों की बारात सजायी जाती है।

इस कथा के अनुसार कृष्ण ने नरकासुर नाम के अत्यंत क्रूर राक्षस को दिवाली से पहले आने वाली चतुर्दशी के दिन मार दिया था। असल में यह नरकासुर की ही इच्छा थी की यह चतुर्दशी उसकी बुराइयों के अंत होने की वजह से एक उत्सव की रूप में मनाई जाए। इसीलिए दीवाली को नरक चतुदर्शी के रूप में भी मनाया जाता है।

नरकासुर एक बहुत अच्छे परिवार से था। कहा जाता है कि वह भगवान विष्णु का पुत्र था। विष्णु जी ने जब जंगली शूकर यानी वराह अवतार लिया, तब नरक उनके पुत्र के रूप में पैदा हुआ। इसलिए उसमें कुछ खास तरह की दुष्‍ट प्रवृत्तियां थीं। सबसे बड़ी बात कि नरकासुर की दोस्ती मुरा असुर से हो गई, जो बाद में उसका सेनापति बना।

दोनों ने साथ मिल कर कई युद्ध लड़े और हजारों को मारा। कृष्ण ने पहले मुरा को मारा। मुरा को मारने के बाद ही कृष्ण का नाम मुरारी हुआ। कहा जाता है कि मुरा के पास कुछ ऐसी जादुई शक्तियां थीं, जिनकी वजह से कोई भी व्यक्ति उसके सामने युद्ध में नहीं ठहर सकता था। एक बार मुरा खत्म हो गया तो नरकासुर से निपटना आसान था।

बुराई पर अच्‍छाई को महत्‍व देने का संदेश

कहते हैं कि नरकासुर ने प्रार्थना की थी कि उसकी मृत्यु का उत्सव मनाया जाए। बहुत से लोगों को मुत्यु के पलों में ही अपनी सीमाओं का अहसास होता है। अगर उन्हें पहले ही इसका अहसास हो जाए तो जीवन बेहतर हो सकता है, लेकिन ज्यादातर लोग अपने आखिरी पलों का इंतजार करते हैं। नरकासुर भी उनमें से एक था। अपनी मृत्यु के पलों में अचानक उसे अहसास हुआ कि उसने अपना जीवन कैसे बरबाद कर दिया और अब तक अपनी जिंदगी के साथ क्या कर रहा था।

उसने कृष्ण से प्रार्थना की, ‘आप आज सिर्फ मुझे ही नहीं मार रहे, बल्कि मैंने अब तक जो भी बुराइयां या गलत काम किए हैं, उन्हें भी खत्म कर रहे हैं। इस मौके पर उत्सव होना चाहिए।’ इसलिए नरक चतुर्दशी को एक राक्षस की बुराइयों के खत्म होने का उत्सव नहीं मनाना चाहिए, बल्कि आपको अपने भीतर की तमाम बुराइयों के खत्म होने का उत्सव मनाना चाहिए।

कई हैं नाम नरक चतुर्दशी के

नरक चतुर्दशी को नरक चौदस या नर्का पूजा, रूप चतुर्दशी और छोटी दीपावली के नाम से भी मनाते हैं। यह पर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन होता है जो इस बार 6 नवंबर 2018 को मंगलवार के दिन मनाया जायेगा। विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो स्वर्ग प्राप्त करते हैं।

इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले, रात के वक्त उसी प्रकार दिए की रोशनी से अंधकार को भगा दिया जाता है जैसे दिवाली की रात को होता है। इस रात दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं प्रसिद्ध हैं। यह काफी महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला ऐसा त्यौहार माना जाता है जैसे मंत्रियों के बीच राजा।

क्‍यों कहते हैं रूप चतुर्दशी

नरक चतुर्दशी को रूप चौदस भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन प्रातःकाल तिल का तेल लगाकर अपामार्ग यानि चिचड़ी की पत्तियां जल में डालकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। इस दिन व्रत रखने का भी अपना महत्व है। ऐसा विश्‍वास किया जाता है कि रूप चौदस पर व्रत रखने से भगवान श्रीकृष्ण व्यक्ति को सौंदर्य प्रदान करते हैं। इस व्रत में प्रात स्‍नान के बाद भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण के दर्शन करने चाहिए। ऐसा करने से पापों का नाश होता है और सौंदर्य प्राप्‍त होता है।

खास है पूजन

नरक चतुर्दशी को अरूणोदय से पहले प्रत्‍यूष काल में स्‍नान करना चाहिए, इससे मृत्‍यु के पश्‍चात यमलोक नहीं जाना पड़ता है। प्रात:काल स्‍नान के बाद घर के बाहर नाली के पास तेल का दिया जलाना चाहिए। नरक चौदस की शाम को दीपदान की परंपरा है जिसे यमराज के निमित्‍त किया जाता है। इस रात में घर का सबसे बुजुर्ग व्‍यक्ति पूरे घर में एक दिया जलाकर घुमाता है और फिर उसे घर से बाहर कहीं दूर जाकर रख

देता है। इस दिए को यम दीया कहते हैं। इस दौरान परिवार के बाकी सदस्य घर में अंदर ही रहते हैं। ऐसी मान्‍यता है कि इस प्रकार दिए को घर में घुमाकर बाहर ले जाने के साथ ही सभी नकारात्‍मक शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं। इस दिन एक दीपक पितरों के नाम से भी जलाया जाता है। इस दीपक को जला कर उन सभी पितरों को मोक्ष मिल जाता है जिनकी अकाल मृत्‍यु होती है।