मल्टीमीडिया डेस्क। जब-जब धरती पर दुष्टों के अत्याचार बढ़े हैं भगवान ने किसी न किसी स्वरूप मे पृथ्वी पर अवतरण लेकर दुष्टों का संहार किया है। धरती को अत्याचारियों के अत्याचार से मुक्ति दिलवाई है और जगत कल्याण किया है। भगवान ने धरती पर अनेक रुपों में अवतार लिया है धरती के पापों के बोझ को खत्म किया है। भगवान विष्णु के एक ऐसे ही अवतार थे नृसिंह अवतार।

नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है। श्रीहरी ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण कर धरती पर अवतरण लिया था। उन्होंने दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध कर धरती को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी।

महर्षि कश्यप की संतान था हिरण्यकशिपु

प्राचीन काल में कश्यप नामक एक ऋषि थे। उनकी पत्नी का नाम दिति था। महर्षि कश्यप और दिति के दो पुत्र थे। एक का नाम 'हरिण्याक्ष' तथा दूसरे का 'हिरण्यकशिपु' था। हिरण्याक्ष का वध भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर किया था। अपने भाई कि मृत्यु से क्रोधित हिरण्यकशिपु ने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का संकल्प किया। बरसों तक कठोर तप कर उसने ब्रह्माजी से अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान मिलते ही उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। उसने ऐसे वरदान भी प्राप्त किया था कि देव, दानव. मानव, पशु, घर, बाहर, दिन रात कहीं भी किसी भीतर से उसकी मृत्यु न हो।

हिरण्यकशिपु के स्वर्गाधिपति बनते ही देवताओं में हाहाकार मच गया। हिरण्यकशिपु ने चारों और अत्याचार शुरू कर दिए। इस दौरान हिरण्यकशिपु कि पत्नी कयाधु ने एक बच्चे को जन्म दिया। बच्चे का नाम प्रहलाद रखा गया। राक्षस कुल में जन्म होने के बावजूद प्रहलाद मन भक्तिभाव में रमता था। वह श्रीहरी का अनन्य भक्त था और अपने पिता के अत्याचारों का विरोध भी करता था।

हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद को मारने के किए कई प्रयास

हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद को प्रभु भक्ति से हटाने के लिए कई जतन किए। प्रलोभन देने से लेकर डराया धमकाया तक गया। यहां तक की प्रहलाद को मारने तक से हरसंभव प्रयास किए गए। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से वह हर विपत्ति से बच गया। जब कोई युक्ति काम नहीं आई तो हिरण्यकशिपु ने उसको अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जिन्दा जलाकर मारने का प्रयास किया गया। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती है, परंतु जब प्रह्लाद को होलिका की गोद में बिठाकर अग्नि प्रज्वलित की गई तो आग में होलिका तो जलकर राख हो गई, किंतु प्रह्लाद दहकती आग में सुरक्षित बच निकला।

इस घटना से हिरण्यकशिपु बहुत क्रोधित हुआ और एक दिन जब प्रहलाद भगवान विष्णु की पूजा कर रहा था तो हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि बता तेरा भगवान कहां है? प्रहलाद ने जवाब में कहा कि भगवान तो सर्वत्र है और वह हर कहीं विद्यमान है।

भगवान नृसिह ने खंभे से प्रकट होकर किया हिरण्यकशिपु का वध

हिरण्यकशिपु ने क्रोधित होकर कहा कि क्या तेरा भगवान इस खंभे में भी है? तो प्रहलाद ने हां में उत्तर दिया। इतना सुनते ही हिरण्यकशिपु ने खंभे पर जोरदार प्रहार किया। तभी खंभे को चीरकर भगवान श्रीनृसिंह प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु को पकड़कर अपनी जाँघों पर रखकर उसकी छाती को नखों से फाड़ डाला और उसका वध कर दिया। साथ ही भक्त प्रहलाद की भक्ति से प्रसन्न होकर उसको वर दिया। इस कारण भगवान नृसिह के प्रकटोत्सव को नृसिह जयंती के रूप में मनाया जाता है।


नृसिंह जयंती के दिन इन मंत्रों का जाप करने से समस्त दुखों का निवारण होता है।

. ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।

नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम।।

. ॐ नृम नृम नृम नर सिंहाय नमः ।।