अनीता जैन

हमारे पौराणिक आख्यानों में नारद को नारायण के भक्त की तरह चित्रित किया गया है। वे नारायण के पार्षद भी कहे जाते हैं। इन्हीं नारायण का प्राकट्य पर्व ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है।

नारद जन्म की कथा

शास्त्रों के अनुसार पूर्व जन्म में नारद 'उपबर्हण" नाम के गन्धर्व थे। एक बार ब्रह्माजी ने उपबर्हण को उनके अशिष्ट आचरण के कारण शूद्र योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। श्राप के फलस्वरूप वे'शूद्रादासी" के पुत्र हुए। बचपन से ही साधु-संतों के साथ रहने के कारण इस बालक के चित्त में रजोगुण और तमोगुण को नाश करने वाली भक्ति का प्रादुर्भाव हो गया था।

निरंतर श्री नारायण की भक्ति करते हुए उन्हें एक दिन भगवान की एक झलक विद्युत रेखा की तरह दिखाई दी और तत्काल ही अदृश्य हो गई। यह बालक नारायण के उस स्वरूप को ह्रदय में समाहित करके बार-बार दर्शन करने की चेष्टा करने लगा,परन्तु उसे पुन: नहीं देख सका। इतने में अदृश्य शक्ति की आवाज़ सुनाई दी-'हे दासीपुत्र ! अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा, अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद हो जाओगे"।

समय बीतने पर बालक का शरीर छूट गया और कल्प के अंत में जिस समय भगवान नारायण एकार्णव (प्रलयकालीन समुद्र) के जल में शयन करते हैं उस समय उनके ह्रदय में शयन करने की इच्छा से सारी सृष्टि को समेटकर ब्रह्माजी जब प्रवेश करने लगे,तब उनके श्वास के साथ दासीपुत्र की आत्मा भी श्री हरि के हृदय में प्रवेश कर गई।

एक सहस्त्र चतुर्युगी बीत जाने पर ब्रह्मा जागे और उन्होंने सृष्टि की रचना करने की इच्छा की, तब उनकी इंद्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मानस पुत्र के रूप में नारदजी अवतीर्ण हुए और ब्रह्माजी के मानस पुत्र कहलाए।

तभी से श्री नारायण के वरदान से नारद मुनि वैकुण्ठ सहित तीनों लोकों में बिना किसी रोक-टोक के विचरण करने लगे।

इन्हें अजर-अमर माना गया है। स्वर ब्रह्म से विभूषित भगवान विष्णु की दी हुई इनकी वीणा भगवन जप 'महत" के नाम से जानी जाती है,उससे श्रीमन नारायण-नारायण की ध्वनि निकलती है।माना जाता है कि वीणा पर तान छेड़कर प्रभु की लीलाओं का गान करते हुए ये ब्रह्ममुहूर्त में सभी जीवों की गति देखते हैं।

योगेश्वर श्री कृष्ण ने गीता में नारद जी को अपना ही स्वरूप मानते हुए कहा है कि देवर्षीणांचनारद:।अर्थात देवर्षियों में, मैं नारद मुनि हूं। देवर्षि नारद व्यासजी,वाल्मीकि तथा परम ज्ञानी शुकदेव जी के गुरु हैं। नारद मुनि सच्चे सहायक के रूप में हमेशा सच्चे और निर्दोष लोगों की पुकार श्री हरि तक पहुंचाते थे।

इन्होंने देवताओं के साथ-साथ असुरों का भी मार्गदर्शन किया,यही कारण है कि सभी लोकों में उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। मान्यता है कि दो पौराणिक और अमूल्य ग्रन्थ रामायण और श्रीमदभागवत पुराण मनुष्यों तक नारद जी ने ही पहुंचाए। भगवत भक्ति की स्थापना, प्रचार एवं लोककल्याण ही इनके जीवन का मूल उद्देश्य था।

अविवाहित रहे नारद

नारदजी की कथा के अनुसार उनका विवाह उनके पिता ब्रह्माजी के कारण नहीं हुआ। माना जाता है कि एक बार ब्रह्माजी ने नारदजी को सृष्टि चलाने में उनकी सहायता करने हेतु विवाह करने के लिए कहा था, किंतु नारदजी ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने से इंकार कर दिया। ब्रह्मदेव के बहुत समझाने पर भी देवर्षि जब अपनी बात पर अडिग रहे तब ब्रह्माजी अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने ही पुत्र को आजीवन अविवाहित रहने का श्राप दे दिया।

सदैव यात्रित नारद

नारद किसी भी जगह ज्यादा लंबा ठहर नहीं पाते हैं। इसके पीछे भी एक कथा है। कथा के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति ने करीब 3 हजार वर्षों तक कड़ी तपस्या की, उनकी तपस्या से प्रसन्ना होकर माता जगदम्बा ने उन्हें दर्शन दिए।

मां जगदम्बा ने उन्हें कहा कि वे उनकी बेटी के रूप में जन्म लेंगी और शिव से विवाह करेंगी। लेकिन इसके साथ ही जगदंबा ने उन्हें यह भी चेतावनी दी कि आगामी जीवन में कभी भी अगर उन्होंने अपनी बेटी अर्थात उनके अपने अवतार का निरादर किया तो वह उसी पल अपना जीवन समाप्त कर लेगी।

राजा दक्ष ने राजा पंचजन की पुत्री आसक्ति से विवाह किया था और उनके दस हजार पुत्र हुए, लेकिन किसी ने भी उनके राजपाट का उत्तराधिकारी होना स्वीकार नहीं किया। जिसका कारण रहे नारद, क्योंकि नारद ने ही उनके पुत्रों को मोक्ष की राह पर चलना सिखाकर उन्हें अपने परिवार से दूर कर दिया था।

दक्षा प्रजापति ने पंचजनी से भी विवाह किया और इनके एक हजार पुत्र हुए लेकिन नारद मनुष्य का मस्तिष्क परिवर्तन करने में माहिर माने जाते हैं और उन्होंने दक्ष के उन सभी पुत्रों को भी हर प्रकार की मोह-माया से दूर कर दिया। नारद के ऐसे व्यवहार ने दक्ष को अत्याधिक क्रोधित कर दिया और क्रोध के आवेश में आकर दक्ष ने नारद को श्राप दिया कि वे सदा भटकते ही रहेंगे। जब ब्रह्मा को दक्ष के क्रोध की वजह से नारद को मिले इस श्राप का पता चला तो वह दक्ष को शांत करवाने के लिए उनके पास गए।

विष्णु को नारद ने दिया श्राप

रामायण के एक प्रसंग के अनुसार नारद मुनि के श्राप के कारण ही त्रेता युग में भगवान राम को सीता जी से वियोग सहना पड़ा था। कथा के अनुसार देवर्षि नारद को अहंकार हो गया था कि उनकी नारायण भक्ति और ब्रह्मचर्य को कामदेव भी भंग नहीं कर सकते हैं। तब भगवान विष्णु ने उनका अहंकार दूर करने के लिए अपनी माया से एक सुन्दर नगर का निर्माण किया।

यहां राजकुमारी के स्वयंवर का आयोजन किया जा रहा था तभी नारद मुनि भी वहां पहुंच गए और राजकुमारी को देखते ही उस पर मोहित हो गए। नारद जी के मन में उस राजकुमारी से विवाह करने की इच्छा जाग्रत हो गई इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु से उनके जैसा सुन्दर रूप मांगा। नारद भगवान विष्णु से सुन्दर रूप लेकर राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे लेकिन वहां पहुंचते ही उनका मुख बन्दर जैसा हो गया।

ऐसा रूप देखकर राजकुमारी को नारदमुनि पर बहुत क्रोध आया और तत्पश्चात भगवान विष्णु राजा के रूप में आए और राजकुमारी को लेकर चले गए। नारद जी को जब पूरी बात पता हुई तो उन्हें बहुत क्रोध आया।

नारद जी भगवान विष्णु के पास गए और श्राप दिया कि जिस तरह आज मैं स्त्री के लिए व्याकुल हो रहा हूं, उसी प्रकार मनुष्य जन्म लेकर आपको भी स्त्री वियोग सहना पड़ेगा। माया का प्रभाव हटने पर नारद जी को बहुत दु:ख हुआ उन्होंने भगवान से क्षमा-याचना की लेकिन तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि यह सब माया का प्रभाव था इसमें आपका कोई दोष नहीं है।

परम ज्ञानी हैं नारद

देवर्षि नारद को श्रुति-स्मृति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, खगोल-भूगोल, ज्योतिष और योग जैसे कई शास्त्रों का प्रकांड विद्वान माना जाता है। देविर्षि नारद के सभी उपदेशों का निचोड़ है- सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तितै: भगवानेव भजनीय:। अर्थात सर्वदा सर्वभाव से निश्चित होकर केवल भगवान का ही ध्यान करना चाहिए।

बताए हैं भक्ति के रहस्य

वीणा को बजाते हुए हरिगुन गाते हुए वो तीनों लोकों में विचरण करते हुए अपनी भक्ति संगीत से तीनों लोकों को तारते हैं। नारद जी ने ही उर्वशी का विवाह पुरुरवा के साथ करवाया। वाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा भी नारद जी ने ही दी। व्यास जी से भागवत की रचना करवायी। ये व्यास, वाल्मीकि और शुकदेव के गुरु हैं। ध्रुव को भक्ति मार्ग का उपदेश दिया। देवर्षि नारद द्वारा लिखित भक्तिसूत्र बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें भक्ति के रहस्य और सूत्र बताये गए हैं।