मल्टीमीडिया डेस्क। सनातन संस्कृति में तिथि, व्रत और त्यौहारों के अनुसार देवी-देवताओं की आराधना का विशेष महत्व है। वैसे तो देवी-देवताओं की उपासना सालभर की जाती है, लेकिन पर्व, त्यौहारों और उत्सवों के मौके पर की गई आराधना से विशेष फल मिलता है।

सनातन संस्कृति में प्रत्येक मास को दो पक्षों में विभाजित किया गया है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। दोनों पक्षों में 15-15 तिथियां होती है। प्रत्येक तिथि के स्वामी देवी-देवता होते हैं और इनकी आराधना इनसे संबंधित तिथियों पर की जाती है। चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणेश हैं और इस तिथि पर इनकी आराधना का विशेष प्रावधान है।

धर्मशास्त्रों में श्रीगणेश को प्रथम पूज्य देवता कहा गया है। किसी भी मांगलिक, धार्मिक प्रसंग से पहले इनको न्यौता देकर आमंत्रित किया जाता है और कार्यक्रम के समापन पर विधिवत विदाई का प्रावधान है। मान्यता है कि गणेशजी को संकटनाशक कहा जाता है इसलिए इनकी आराधना करने से सभी प्रकार के संकटों का नाश होता है। गणेशजी की तिथि चतुर्थी को इनकी पूजा करने ने सभी विघ्नों का नाश होता है।

हर मास में दो चतुर्थी आती है। पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं और अमावस्या के बाद आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। संकष्टी चतुर्थी पर श्रीगणेश की आराधना से धन, सेहत, मन से जुड़ी सभी समस्याओं का नाश होता है। इस दिन भगवान गणेश की विधिवत पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है और सभी विघ्नों का हरण होता है।

इस तरह से करें गणेश पूजा

संकष्टी चतुर्थी पर सूर्योदय से पहले उठ जाएं। स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा के लिए बैठे और लाल कपड़ा बिछाकर गणेशजी की स्थापना करें। उनको लाल फूल समर्पित करने के साथ अबीर, कंकू, गुलाल, हल्दी, मेंहदी, मौली चढाएं। मोदक, लड्डू, पंचामृत और ऋतुफल का भोग लगाएं। इसके बाद गणपति अथर्वशीर्ष, श्रीगणपतिस्त्रोत या गणेशजी के वेदोक्त मंत्रों का पाठ करें। आरती करने के बाद भगवान से अपनी मनोकामना पूर्ति की विनती करें।