रायपुर। पुरखों को श्रद्धा से याद किया जाने वाला पितृ पक्ष छत्तीसगढ़ में 'पितर पाख' नाम से जाना जाता है। पितर पाख 5 सितंबर से शुरू होकर 19 सितंबर सर्व पितृमोक्ष अमावस्या तक मनाया जाएगा। जिस तिथि को पूर्वजों की मृत्यु हुई है, उसी तिथि को नदी-तालाबों में स्नान करके पितरों को जल अर्पित करके उनके नाम पर ब्राह्मणों को भोज करने की परंपरा निभाई जाएगी।

पहले दिन पितर बैसकी की परंपरा निभाएंगे

महामाया मंदिर के पुजारी पं.मनोज शुक्ला के अनुसार पितर पाख के पहले दिन को पितर बैसकी कहा जाता है। पितर हिन्दी तथा बैसकी छत्तीसगढ़ी शब्द है। इसका तात्पर्य पितर को बिठाना होता है। छत्तीसगढ़ की प्रचलित परंपरानुसार घर की बहुएं सुबह सबसे पहले घर की देहरी (दहलीज) व दरवाजे को गोबर से लीपती हैं, जिसे ओरी लीपना कहते हैं। उसके बाद चाँवल के आंटे से सुंदर चौक (रंगोली) पूरकर बीच मे पीढ़ा रखती हैं।

पीढ़ा के दोनों ओर के चौक में कुम्हड़ा, रखिया व दुधमोंगरा के फूल को सजाती हैं। इसके बाद फूलों से सजे सुसज्जिात पीढ़ पर एक लोटा में पानी, दातून व कुशा रखा जाता है। फिर श्रद्घापूर्वक पितरों के निमित्त धूप (गाय के गोबर से बने कंडे को जलाकर चावल, गाय का घी व देसी गुड़) देते हैं। इस तरह से पितर पाख के पहले दिन ही पितर देवताओं को नेवता देकर स्वागत किया जाता है।

सात पीढ़ियों के निमित्त भोजन

पं.शुक्ला बताते हैं कि घर का मुखिया सात पीढ़ी के पितरों के निमित्त तरोई के सात पत्तों में पूड़ी, बड़ा आदि भोज्य पदार्थो को पितर देवताओं को भोग लगाते हैं। फिर घर के मुंडेर पर कौओं के लिए तथा गौ माता, कुत्ते के लिए भी भोजन निकाला जाता है। यथाशक्ति ब्राह्मणो को भोजन कराकर पितरो के पसंद की सामग्री,वस्त्र आदि दान किया जाता है।

पितर पक्ष की खास तिथियां

0 पिता का श्राद्घ अष्टमी और और माता का नवमी को।

0 जिन परिजनों की मृत्यु दुर्घटना या आत्महत्या से उनका श्राद्ध चतुर्दशी को।

0 साधु और संन्यासियों का श्राद्घ द्वाद्वशी को।

0 जिनकी मृत्यु तिथि पता नहीं उनका श्राद्ध अमावस्या कों

तारीख श्राद्ध तिथियां

5 पूर्णिमा

6 प्रतिपदा

7 द्वितीया

8 तृतीया

9 चतुर्थी

10 पंचमी

11 षष्ठी

12 सप्तमी

13 अष्टमी

14 नवमी

15 दशमी

16 एकादशी

17 द्वादशी/ त्रयोदशी

18 चतुर्दशी

19 सर्व पितृ अमावस्याश्राद्घ