कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थनी एकादशी और देवउठनी एकादशी भी कहते हैं। इस वर्ष देवउठनी 3 नवंबर को मनाई जाईगी। भारत के अवध क्षेत्र में देवोत्थनी एकादशी का विकृत रूप 'डिठवन' अधिक प्रचलित है। कहते हैं इस दिन क्षीर सागर में शयनरत् भगवान श्री विष्णु चार माह बाद की गहरी नींद से जागते हैं।

विष्णुजी के शयन-काल के दरम्यान विवाह और शुभकार्यों पर विराम लग जाता है। देवउठनी एकादशी से मांगलिक कार्य शुरु हो जाते हैं। मान्यता है कि हरि के उठने के बाद से ही सभी तरह के मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं।

इस तरह करें पूजा

व्रती स्त्रियां इस दिन नित्य कर्म करने के बाद आंगन में चौक बनाएं। भगवान श्री विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से आंगन में अंकित करें। दिन की तेज धूप में विष्णु जी के चरणों को ढांक दिया जाए, ताकि उनके चरणों को सूर्य का प्रकाश न लगने पाए। रात्रि को विधिवत् पूजन के बाद भगवान को जगाया जाता है। इसके बाद पूजा करके कथा सुनी जाती है।

व्रत की कथा

एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। प्रजा तथा नौकर-चाकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन किसी दूसरे राज्य से एक व्यक्ति राजा के पास आकर कहने लगा कि मुझे नौकरी पर रख लो तो राजा ने उसके सामने एक शर्त रखी।

राजा ने कहा तुम्हें रोज खाने के लिए सब कुछ मिलेगा लेकिन एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा। वह व्यक्ति राजा की इस शर्त को मान गया। एकादशी आने पर जब उसे फलाहार दिया गया। तो वह राजा के सामने जाकर बोला कि मेरा फलाहार से पेट नहीं भरेगा।

राजा को उस पर दया आ गई और राजा ने उसे आटा-दाल दे दिया। नौकर रोज की तरह नदी किनारे पहुंचा। वह स्नान करने के बाद भोजन को पकाने लगा। भोजन बनाने के बाद वह भगवान को बुलाने लगा। उसके बुलाने पर भगवान पीताम्बर रूप धारण कर उसके सामने आए। भोजन करने के बाद भगवान अपने धाम पर चले गए और वह नौकर भी अपने काम की पर चला गया।

अब पंद्रह दिनों के बाद अगली एकादशी आने पर उसने राजा से कहा कि मुझे खाना बनाने के लिए दुगुना सामान दीजिए। राजा ने पूछा ऐसा क्यों, तो नौकर बोला कि भगवान भी उसके साथ खाना खाने आते हैं इसलिए भोजन कम पड़ जाता है।

राजा बोला मैं तो इतने व्रत आदि रखता हूं कभी भगवान मेरे साथ भोजन करने नहीं आए तुम्हारे पास कैसे आ सकत हैं। नौकर बोला, यदि आपको विश्वास न हो तो मेरे साथ चलकर स्वयं ही देख लीजिए। राजा के एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गए।

नौकर ने रोज की तरह भोजन बनाया और भगवान को शाम तक पुकारता रहा, पर भगवान नहीं आए। उसने भगवान से कहा यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग कर दूंगा। पर भगवान नहीं आए। नौकर जब आत्महत्या करने के लिए आगे बड़ा तो भगवान प्रकट हो गए और उन्होंने उसे रोक लिया। भक्त और भगवान ने साथ मिलकर भोजन किया। भगवान अपने भक्त को लेकर अपने धाम चले गए।

दोनों को देख राजा विचार करने लगा कि व्रत-उपवास से तब तक कुछ फायदा नहीं मिलता जब तक कि मन साफ न हो। इससे राजा को भी ज्ञान प्राप्त हुआ और अंत में वह भी स्वर्ग को प्राप्त कर सका।