ओशो

एक मित्र ने पूछा है कि क्या भारत में कोई राष्ट्रभाषा होनी चाहिए? यदि हां, तो कौन सी?

राष्ट्रभाषा का सवाल ही भारत में बुनियादी रूप से गलत है। भारत में इतनी भाषाएं हैं कि राष्ट्रभाषा सिर्फ लादी जा सकती है और जिन भाषाओं पर लादी जाएगी उनके साथ अन्याय होगा। भारत में राष्ट्रभाषा की कोई भी जरूरत नहीं है। भारत में बहुत सी राष्ट्रभाषाएं ही होंगी और आज कोई कठिनाई भी नहीं है कि राष्ट्रभाषा जरूरी हो। रूस बिना राष्ट्रभाषा के काम चलाता है तो हम क्यों नहीं चला सकते। आज तो यांत्रिक व्यवस्था हो सकती है संसद में, बहुत थोड़े खर्च से, जिसके द्वारा एक भाषा सभी भाषाओं में अनुवादित हो जाए।

लेकिन राष्ट्रभाषा का मोह बहुत महंगा पड़ रहा है। भारत की प्रत्येक भाषा राष्ट्रभाषा होने में समर्थ है इसलिए कोई भी भाषा अपना अधिकार छोड़ने को राजी नहीं होगी - होना भी नहीं चाहिए। लेकिन यदि हमने जबरदस्ती किसी भाषा को राष्ट्रभाषा बना कर थोपने की कोशिश की तो देश खंड-खंड हो जाएगा। आज देश के बीच विभाजन के जो बुनियादी कारण हैं उनमें भाषा एक है। राष्ट्रभाषा बनाने का खयाल ही राष्ट्र को खंड-खंड में तोड़ने का कारण बनेगा। अगर राष्ट्र को बचाना हो तो राष्ट्रभाषा से बचना पड़ेगा। और अगर राष्ट्र को मिटाना हो तो राष्ट्रभाषा की बात आगे भी जारी रखी जा सकती है।

मेरी दृष्टि में भारत में जितनी भाषाएं बोली जाती हैं, सब राष्ट्रभाषाएं हैं। उनको समान आदर उपलब्ध होना चाहिए। किसी एक भाषा का साम्राज्य दूसरी भाषाओं पर बरदाश्त नहीं किया जाएगा, वह भाषा चाहे हिंदी हो और चाहे कोई और हो। कोई कारण नहीं है कि तमिल या तेलगू या बंगाली या गुजराती को हिंदी दबाए। लेकिन गांधी जी के कारण कुछ बीमारियां इस देश में छूटीं, उनमें एक बीमारी हिंदी को राष्ट्रभाषा का वहम देने की भी है। हिंदी को यह अहंकार गांधी जी दे गए कि वह राष्ट्रभाषा है। तो हिंदी प्रांत उस अहंकार से परेशान हैं और वह अपनी भाषा को पूरे देश पर थोपने की कोशिश में लगे हुए हैं। हिंदी का साम्राज्य भी बरदाश्त नहीं किया जा सकता हैं, किसी भाषा का नहीं किया सकता हैं। सिर्फ संसद में हमें यांत्रिक व्यवस्था करनी चाहिए कि सारी भाषाएं अनुवादित हो सकें। और वैसे भी संसद कोई काम तो कोई करती नहीं है कि कोई अड़चन हो जाएगी। सालों तक एक-एक बात पर चर्चा चलती है, थोड़ी देर और चल लेगी तो कोई फर्क नहीं होने वाला है। संसद कुछ करती हो तो भी विचार होता कि कहीं कार्य में बाधा न पड़ जाए। कार्य में कोई बाधा पड़ने वाली नहीं मालूम होती हैं।

फिर मेरी दृष्टि यह भी है कि यदि हम राष्ट्रभाषा को थोपने का उपाय न करें तो शायद बीस पच्चीस वर्षोंं में कोई एक भाषा विकसित हो और धीरे-धीरे राष्ट्र के प्राणों को घेर ले। वह भाषा हिंदी नहीं होगी, वह भाषा हिंदुस्तानी होगी। उसमें तमिल के शब्द भी होंगे, तेलगू के भी, अंग्रेजी के भी, गुजराती के भी, मराठी के भी। वह एक मिश्रित नई भाषा होगी जो धीरे-धीरे भारत के जीवन में से विकसित हो जाएगी। लेकिन, अगर कोई शुद्धतावादी चाहता हो कि शुद्ध हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना है तो यह सब पागलपन की बातें है। इससे कुछ हित नहीं हो सकता है।

एक मित्र ने यह भी पूछा है कि क्या अंग्रेजी को देश से हटाया जाए?

अंग्रेजी को देश से हटाना बहुत आत्मघाती होगा। विगत दो सौ वर्षों में अंग्रेजी के माध्यम से हम जगत से संबंधित हुए हैं। और विगत दो सौ वर्षों में जो भी महत्वपूर्ण निर्मित हुआ है, वह अंग्रेजी भाषा-भाषी लोगों के द्वारा निर्मित हुआ है। आने वाले भविष्य में भी अंग्रेजी का जगत निरंतर विकास आविष्कार और खोज करता रहेगा। यदि अंग्रेजी को भारत से हटाने की चेष्टा की गई तो हम अपने हाथ से जगत से टूट कर एक कुएं में बंद हो जाएंगे। वह बहुत महंगा पड़ेगा। लेकिन हमको सुखद लग सकता है कि अंग्रेजी अंग्रेजों की भाषा है इसलिए हटाओ। लेकिन अब सवाल अंग्रेजों की भाषा का नहीं, अब सवाल अंतर्राष्ट्रीय भाषा का है। और हमें अच्छा लग सकता है कि अंग्रेजों की भाषा है इसलिए हटाओ, तो अंग्रेजों की मोटरें, और रेलगाड़ियां और हवाई जहाज हटाने के संबंध में क्या खयाल है? सारी टेक्नालॉजी पश्चिम से आई है और अगर उस टेक्नालॉजी में दुनिया के साथ खड़े होना है तो अंग्रेजी पर अधिकार अत्यंत आवश्यक है। हमारे हित में है, पश्चिम के हित में नहीं है।

आज सारी दुनिया धीरे-धीरे अंग्रेजी जगत से संबंधित होती जा रही है। हर युग की एक भाषा होती है। उस युग की भाषा वही होती है जो उस युग को सर्वाधिक दान देती है। हमारे देश की कोई भी भाषा अभी जगत भाषा नहीं बन सकती क्योंकि जगत के विकास में हमारा आज कोई कंट्रीब्यूशन, कोई दान नहीं है। न हमने यंत्र दिए हैं, न समृद्धि दी है, न सुख दिया है। हमने विश्व को रूपांतरित करने के लिए आज कुछ भी नहीं दिया है। जो भाषा आज सर्वाधिक दान करेगी वही भाषा जगत की भाषा बनेगी। हमें इतने समर्थ होना पड़ेगा, इतने आविष्कारक, इतने वैज्ञानिक, तब हमारी कोई भाषा जागतिक महत्व की हो सकती है लेकिन आज अंग्रेजी से अपने को तोड़ना बहुत महंगा पड़ जाएगा।

सच तो यह है कि अंग्रेजों के जाने के बाद हमें अंग्रेजी को बचाने की तीव्रतम चेष्टा करनी चाहिए। सौभाग्य से या दुर्भाग्य से ऐतिहासिक संयोग था कि हमें डेढ़ सौ या दो सौ वर्ष अंग्रेजी से संबंधित होने का मौका मिला। इस मौके को हम अपना वरदान सिद्ध कर सकते हैं। आज दुनिया में गैर-अंग्रेजी भाषी देशों में हमारा देश अकेला देश है जो ढंग से अंग्रेजी में सोच सकता है, विचार सकता है, बात कर सकता है। इस मौके को खो नहीं देना चाहिए। यह मौका हमने खोया है। बीस वर्षों में अंग्रेजी की क्षमता हमारी निरंतर कम हुई है क्योंकि हमको यह खयाल है कि अब अंग्रेजी की कोई जरूरत नहीं है। अंग्रेजी की जरूरत रोज-रोज बढ़ती चली जाएगी। न केवल अंग्रेजी की जरूरत पड़ेगी बल्कि भविष्य में हमें रूसी भी सीखनी पड़ेगी, चीनी भी सीखनी पड़ेगी। भविष्य में हमें और जगतिक भाषाओं पर भी अधिकार उपलब्ध करना पडेगा। जिस पर है, देश के नासमझ नेता उसको छोड़ने की बात कर रहे हैं। जिन पर नहीं है, उन पर अधिकार करने की बात तो बहुत दूर है।

अंग्रेजी बचाने की चेष्टा अत्यंत जरूरी है। लेकिन अंग्रेजी को कोई राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत नहीं है। अंग्रेजी हमारी भाषा नहीं है इसलिए राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। राष्ट्रभाषा की जरूरत ही नहीं है। देश की सभी भाषाएं राष्ट्रभाषा की हैसियत से काम करें, अंग्रेजी हमारा अंतरराष्ट्रीय संबंध की भाषा रहे और उसमें जितने निष्णात हो सकें, उतना अच्छा है। लेकिन अंग्रेजी के साथ गुलामी का दंश जुड़ गया। उस दंश से हमें बचना चाहिए और गुलामी ने कुछ अच्छाइयां भी दी हैं और कुछ बुराइयां भी दी हैं। बुराइयों को काट डालना जरूरी है, अच्छाइयों को बचा लेना जरूरी है। सिर्फ इसलिए कि वह गुलामी के क्षणों में हम पर आयीं, उनसे छूट जाना अपने ही हाथों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना होगा।