किरण वाईकर। भारत को सोमवार को केपटाउन टेस्ट मैच के चौथे ‍ही दिन दक्षिण अफ्रीका के हाथों 72 रनों से हार का सामना करना पड़ा। भारतीय उपमहाद्वीप में शेर बनी हुई दुनिया की नंबर वन टीम को अब समझ आया होगा कि बेजान पिचों पर रनों की फसल काटना और तेज उछालवाली पिच पर गेंद के कहर से खुद को बचाने में कितना अंतर होता है। सूखे से जूझ रहे केपटाउन में मैच के तीसरे दिन बारिश होना मेजबान टीम के लिए वरदान साबित हुआ और चौथे दिन विकेटों की पतझड़ के बीच विराट कोहली के जांबाजों ने आत्मसमर्पण कर दिया।

भारत के पास दक्षिण अफ्रीका में टेस्ट जीतने का सबसे अच्छा मौका केपटाउन में था, क्योंकि यह शहर पिछले काफी समय से सूखे से जूझ रहा था। इसके चलते इस पिच पर बाउंस (उछाल) अपेक्षाकृत कम रहने के आसार थे, लेकिन मैच के तीसरे दिन जोरदार बारिश हुई।

मैच का एक दिन खराब हुआ, लेकिन मेजबान टीम के लिए इतना काफी था। चौथे दिन कुल 18 विकेट गिरे और टीम इंडिया 208 जैसे मामूली लक्ष्य का पीछा करती हुई 135 रनों पर सिमट गई। भारतीय गेंदबाजों का प्रदर्शन सराहनीय रहा, लेकिन मेजबान टीम के पुछल्ले बल्लेबाजों द्वारा पहली पारी में जोड़े गए 100 से ज्यादा रन ही दक्षिण अफ्रीका के लिए महत्वपूर्ण साबित हुए। केपटाउन में तीन दिन के पूरे खेल के पहले ही मैच गंवाने वाली टीम इंडिया के लिए अगले दो मैच (सेंचुरियन और जोहान्सबर्ग) अब बहुत ज्यादा चुनौतीपूर्ण साबित होंगे।

टीम इंडिया को इस साल दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में खेलना है। दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में तो वह कभी भी टेस्ट सीरीज नहीं जीत पाया है। द. अफ्रीका में वह 6 सीरीज और ऑस्ट्रेलिया में 11 सीरीज खेल चुका है, लेकिन सफलता उससे दूर ही रही है। इंग्लैंड में भी वह 17 सीरीज में से मात्र 3 जीतने में सफल रहा है।

उपमहाद्वीप के बाहर भारतीय टीम की असफलता के मुख्य कारण

- तेज और उछालवाली पिच

- सुनियोजित दौरा कार्यक्रम का अभाव

- पिच तथा परिस्थितियों के अभ्यस्त नहीं हो पाने का खामियाजा

- सरदर्द साबित होते विपक्षी टीम के पुछल्ले बल्लेबाज

- मददगार साबित नहीं होने वाली पिचों पर प्रभावहीन गेंदबाजी

तेज पिचों पर क्यों असफल होते हैं भारतीय बल्लेबाज

टीम इंडिया को दक्षिण अफ्रीका के चुनौतीपूर्ण दौरे में 3 टेस्ट, 6 वनडे और 3 टी20 मैच खेलने है। फैंस को दुनिया की दो दिग्गज टीमों भारत (125 अंक) और दक्षिण अफ्रीका (111 अंक) के बीच रोमांचक संघर्ष की उम्मीद रहेगी। टीम इंडिया को इसके बाद जुलाई से सिंतबर तक इंग्लैंड और फिर नवंबर-दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया का दौरा करना है और ये दोनों टीमें भी आईसीसी रैंकिंग में टॉप 5 में शुमार है। इसके चलते टीम इंडिया के लिए आगामी वर्ष बहुत चुनौतीपूर्ण रहेगा और टीम की असली परीक्षा इन 12 महीनों के दौरान ही होगी।

भारतीय बल्लेबाजों को अपने देश की बेजान पिचों पर खेलकर खूब रन बनाने की आदत होती है। इसलिए जब वे दक्षिण अफ्रीका या ऑस्ट्रेलिया की तेज और बाउंसी पिचों पर खेलते हैं तो उनके लिए क्रीज पर टिके रहना और रन बनाना मुश्किल हो जाता है। इन पिचों पर गेंद तेज रफ्तार से आती है और उछाल लिए होती है। इन पिचों पर पूरे विश्वास के साथ हुक, पुल और कट शॉट खेलने वाले बल्लेबाज ही सफल हो पाते हैं।

बेहद चुनौतीपूर्ण होगा द. अफ्रीकी दौरा: जगदाले

बीसीसीआई के पूर्व सचिव और पूर्व सिलेक्टर संजय जगदाले का मानना है कि दक्षिण अफ्रीकी दौरा बहुत चुनौतीपूर्ण होगा। वर्तमान टीम इंडिया को चुनौतियां पसंद है, लेकिन इस दौरे के ठीक पहले श्रीलंका के खिलाफ सीरीज खेलना ठीक फैसला नहीं रहा। इसकी बजाए खिलाड़‍ियों को थोड़ा आराम दिया जाना चाहिए था और द. अफ्रीका जल्दी भेजकर वहां दो-तीन स्तरीय प्रैक्टिस मैच खेलने चाहिए थे।

सुनियोजित दौरा कार्यक्रम का अभाव

दक्षिण अफ्रीका जैसे महत्वपूर्ण दौरे के पहले टीम इंडिया के क्रिकेटरों को कुछ आराम देना चाहिए था जिससे वे तरोताजा होकर इतिहास रचने मैदान में उतरते। इसकी बजाए इससे ठीक पहले श्रीलंका जैसी कमजोर टीम के खिलाफ सीरीज रखकर बोर्ड ने अपने खिलाड़‍ियों को थका दिया। ऐसे दौरों की वजह से क्रिकेटरों के बर्न आउट होने का खतरा मंडराता है।

पिच और परिस्थिति के अभ्यस्त नहीं हो पाते भारतीय बल्लेबाज

हमारी टीम ऐसी महत्वपूर्ण सीरीज के लिए भी एक सप्ताह पहले ही वहां पहुंचती है। इसके चलते जब तक बल्लेबाज पिच और परिस्थितियों के अभ्यस्त होते हैं, टीम सीरीज गंवा चुकी होती है। 2010-11 में भारत ने द. अफ्रीका में शानदार प्रदर्शन किया था, क्योंकि उस वक्त हमारे टेस्ट टीम के प्रमुख बल्लेबाज 10 दिन पहले द. अफ्रीका पहुंच गए थे और उन्होंने वहां गैरी कर्स्टन अकादमी में अभ्यास किया था।

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एशेज सीरीज के लिए टीमें 2-3 सप्ताह पहले ही पहुंच जाती है ताकि परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाया जा सके। हमें भविष्य में दौरा कार्यक्रम तय करते वक्त इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। ऑस्ट्रेलियाई टीम भारत आने से पहले दुबई में आईसीसी एकेडमी में प्रैक्टिस करती है।

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भारतीय तेज गेंदबाजों की समस्या यह है कि यदि विदेशी धरती पर तेज गेंदबाजों की मददगार पिच नहीं मिले तो वे एकदम बेअसर साबित होते हैं। दूसरी तरफ द. अफ्रीकी, इंग्लिश और ऑस्ट्रेलियाई पेसर्स इन पिचों पर भी विकेट निकालने की क्षमता रखते हैं।

इन बल्लेबाजों को दिखाना होगा दम

भारतीय बल्लेबाजों को द. अफ्रीका में सबसे ज्यादा चुनौती मिलेगी, क्योंकि लंबे समय तक सपाट पिचों पर खेलने के बाद अचानक तेज और उछाल लेती गेंदों का सामना करना होगा। कप्तान विराट कोहली इस वक्त जबर्दस्त फॉर्म में हैं और उन्हें सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उठानी होगी। अजिंक्य रहाणे श्रीलंका के खिलाफ असफल रहे, लेकिन उनका भी द. अफ्रीका तथा विदेशी धरती पर प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो चेतेश्वर पुजारा और मुरली विजय के पास द. अफ्रीकी पिचों पर बल्लेबाजी की ज्यादा काबिलियत है, लेकिन उन्हें इसे मैदान पर क्रियान्वित कर दिखाना होगा। रोहित शर्मा को श्रीलंका सीरीज के फॉर्म को द. अफ्रीका में जारी रखना होगा।

स्टेन की वापसी सिरदर्द साबित होगी

दक्षिण अफ्रीका के सबसे अनुभवी तेज गेंदबाज डेल स्टेन पिछले कुछ समय से फिटनेस के चलते मैदान से दूर थे। लेकिन वे भारत के खिलाफ टेस्ट सीरीज में टीम में वापसी करेंगे। स्टेन द. अफ्रीका में हमेशा ही भारत के लिए सिरदर्द साबित हुए हैं। उन्होंने 2010-11 सीरीज में 3 टेस्ट मैचों में 21 शिकार किए थे। 2013-14 में डरबन टेस्ट में स्टेन गन चली थी। भारत वह टेस्ट तथा दो मैचों की सीरीज हार गया था।

(डाटा स्टोरी के लिए तकनीकी सहयोग ICFJ)

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