नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई ) के सदस्यों के लिए एक राज्य एक वोट नीति पर दिए अपने पूर्व के आदेश में संशोधन किया। शीर्ष अदालत ने मुंबई, सौराष्ट्र, वड़ोदरा और विदर्भ के क्रिकेट संघों को बोर्ड की पूर्ण (स्थायी) सदस्यता देने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया।

मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कुछ संशोधनों के साथ बीसीसीआई के मसौदा संविधान (ड्राफ्ट कंस्टीट्यूशन) को भी मंजूरी दे दी। कोर्ट ने रेलवे, सर्विसेज और यूनिवर्सिटीज की भी स्थायी सदस्यता बहाल कर दी। साथ ही बीसीसीआई और उससे संबंधित सभी राज्य संघों को अनुमोदित संविधान को चार हफ्ते में रिकॉर्ड में लाने का आदेश दिया। बेंच में जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी शामिल हैं।

कूलिंग ऑफ पीरियड में हुआ बदलाव : न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि प्रत्येक पदाधिकारी को लगातार दो पदों के बाद कूलिंग ऑफ पीरियड से गुजरना होगा। लोढ़ा समिति के मूल सुधारों में तीन साल के कार्यकाल के बाद क्रिकेट संघ से बाहर रहने की अनिवार्यता का प्रावधान था लेकिन इस आदेश के बाद पदाधिकारियों को लगातार दो कार्यकाल (छह साल) के बाद तीन साल का ब्रेक लेना होगा। कुल कार्यकाल नौ साल का बना रहेगा।अनिवार्य कूलिंग ऑफ पीरियड (प्रतीक्षा अवधि) नियम के चलते कार्यवाहक अध्यक्ष सीके खन्ना, कार्यवाहक सचिव अमिताभ चौधरी और कोषाध्यक्ष अनिरुद्ध चौधरी जैसे दिग्गज BCCI का अगला चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।

बोर्ड के चुनावों का रास्ता होगा साफ : सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति के प्रमुख विनोद राय ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा संविधान को स्वीकार करने के लिए चार सप्ताह की समयसीमा तय करना महत्वपूर्ण है जिससे बोर्ड के चुनावों के लिए भी रास्ता साफ होगा। इसके लिए राज्य संघों को इसका शत-प्रतिशत पालन करना पड़ेगा। उच्चतम न्यायालय ने राज्य संघों को बीसीसीआई का संविधान अपनाने या फिर कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है।