वॉशिंगटन। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड फिजिक्स लैबोरेटोरी के शोधकर्ताओं ने पाया कि जब उल्का पिंडों की बारिश चंद्रमा की सतह पर हुई, तो उसकी सतह से पानी की बूंदे वाष्प बनकर निकलीं। इस एतिहासिक खोज के लिए जरूरी डेटा को अंतरिक्ष एजेंसी के लूनर एटमॉस्फियर एंड डस्ट एन्वायरमेंट एक्सप्लोरर (LADEE) ने जमा किया था।

यह एक रोबोट मिशन था, जिसने चंद्रमा के एक्सोस्फीयर के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए अक्टूबर 2013 से अप्रैल 2014 तक चंद्रमा की परिक्रमा की थी। कैलिफोर्निया के सिलिकॉन वैली में नासा के एमिस रिसर्च सेंटर में LADEE परियोजना के वैज्ञानिक रिचर्ड एल्फिक ने कहा कि चंद्रमा के वायुमंडल में ज्यादातर समय जल (H2O) या OH की महत्वपूर्ण मात्रा नहीं होती है।

नासा की तरफ से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि जब चंद्रमा पर उल्कापिंडों की बारिश होती है, तो उसकी सतह से पर्याप्त मात्रा में वाष्प बाहर निकालती है, जिसका हम पता लगा सकते हैं। जब घटना खत्म हो जाती है, तो वहां से H2O या OH चला जाता है। अध्ययन के निष्कर्ष नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित किए गए हैं।

नासा के अनुसार, इस जानकारी से वैज्ञानिकों को चंद्रमा के जल के इतिहास और चंद्रमा के भूगर्भिक अतीत की समझने के साथ ही उसके लगातार हो रहे विकास को समझने का मौका मिलता है। इस बात के प्रमाण हैं कि चंद्रमा पर पानी मौजूद है। इन निष्कर्षों से ध्रुवों के पास क्रेटरों में जमा होने की घटना को समझाने में मदद कर सकती है।

हालांकि, इस परियोजना पर काम कर रहे वैज्ञानिकों ने इस विचार को खारिज कर दिया है कि पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह पर पता लगाया गया सभी जल उल्का पिंडों से आता है। अन्य बातों के अलावा चंद्रमा पर पानी की उत्पत्ति के बारे में बहस जारी है।