वाशिंगटन। वैज्ञानिकों ने रेडियोएक्टिव प्रदूषण से पेंटिंग्स की दुनिया में चल रही जालसाजी का पता लगाने का तरीका ईजाद किया है। 1963 में परमाणु परीक्षणों पर आंशिक प्रतिबंध को लेकर हुए वैश्विक समझौते से पहले के दशक में दुनिया में बड़े पैमाने पर परमाणु परीक्षण हुए थे। इन परीक्षणों की वजह से वातावरण में रेडियोएक्टिव प्रदूषण बढ़ गया था। अब उस दौर में बढ़े हुए प्रदूषण को ही वैज्ञानिकों ने असली-नकली पेंटिंग्स का पता लगाने का माध्यम बना लिया है।

विज्ञान के अनुसार हर जीव में एक निश्चित अनुपात में कार्बन के तीन प्रकार के परमाणु सी12, सी13 और सी14 पाए जाते हैं। इनमें से सी12 और सी13 स्थिर रहते हैं, जबकि सी14 यानी कार्बन14 रेडियोएक्टिव है। जैसे ही जीव की मृत्यु होती है, उसके शरीर में से सी14 परमाणु कम होने लगता है। सी14 के नष्ट होने की एक निश्चित गति है। इसी को आधार बनाकर किसी जीवाश्म में सी14 के अनुपात का आकलन करते हुए वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वह जीवाश्म लगभग कितने वर्ष या सदी पुराना है। इसे कार्बन डेटिंग कहा जाता है। कार्बन डेटिंग पेड़-पौधों और सभी जीवों पर की जा सकती है।

पिछली सदी में हुए परमाणु परीक्षणों की वजह से वातावरण में कार्बन14 का स्तर बढ़ने लगा था। 1963 में परमाणु परीक्षण पर आंशिक रोक का समझौता होने तक वातावरण में इसका स्तर लगभग दोगुना हो गया था। 1963 के बाद पैदा हुए या मरे हर जीव में इस बढ़े हुए स्तर को देखा जा सकता है। यहां तक कि कैनवस बनाने में इस्तेमाल होने वाली लकड़ियों और फाइबर में भी यह अंतर स्पष्ट है। शोधकर्ता लौरा हेंडरिक ने कहा कि इस सर्वोच्च स्तर को अनोखे मानक की तरह अपनाया जा सकता है। यह अच्छी चीज तो नहीं है, लेकिन फिलहाल कुछ अच्छे कामों में इसका इस्तेमाल संभव है।

कैसे होता है इसका प्रयोग?

किसी पेंटिंग को बनाने में कैनवस का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा उसकी बाइंडिंग में और रंगों को घोलने के लिए कई तरह के तेल आदि का भी प्रयोग किया जाता हैं। ये सभी वस्तुएं कार्बनिक हैं, यानी इनमें कार्बन14 का स्तर मापा जा सकता है। अगर पेंटिंग में इस्तेमाल कैनवस 1963 के बाद बना होगा, तो कार्बन14 की बढ़ी हुई मात्रा का आसानी से पता लग जाएगा। अगर जालसाज ने कहीं से पुराने कैनवस इंतजाम कर लिया होगा, तब भी बाइंडिंग में इस्तेमाल तेल व अन्य कार्बनिक पदार्थों की मदद से पता चल जाएगा कि पेंटिंग 1963 से पहले बनी है या उसके बाद।

कई जालसाज पकड़े गए हैं इस तकनीक की मदद से

अमेरिका में रॉबर्ट ट्रोटर नाम के पेंटर को पकड़ा गया था। 1985 से 1990 के बीच उसने कई पेंटिंग्स बनाईं और उन्हें 100 साल पुराना बताकर बेच दिया। किसी ग्राहक के संदेह पर जांच में उसकी जालसाजी सामने आई। इटली में भी इस तरह का मामला सामने आ चुका है।

तमाम खूबियों के साथ इस तकनीक की कुछ सीमाएं भी हैं। वातावरण में कार्बन14 का बढ़ा हुआ स्तर धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। कुछ साल में स्थिति फिर परमाणु परीक्षण से पहले जैसी ही हो जाएगी। हालांकि कुछ और उन्नत तकनीकों के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने पर यह आगे भी कारगर नतीजे दे सकती है।