ब्राजीलिया। भारतीय संस्कृति में बचपन से ही हमें वक्त की पाबंदी का सबक सिखाया जाता है, लेकिन एक देश ऐसा भी है, जहां समय पर पहुंचना असभ्यता माना जाता है। आपको पार्टी में बुलाया जाए और वक्त पर पहुंच जाएं तो हो सकता है कि मेजबान ही तैयार न मिले। इस देश का नाम है ब्राजील।

ब्राजील, पूरे लैटिन अमेरिका में इकलौता ऐसा देश है, जहां पुर्तगाली जुबान बोली जाती है। पूरी दुनिया से अलग ब्राजील के लोग समय के पाबंद नहीं हैं। वे लेटलतीफ होना सामाजिक परंपरा का हिस्सा मानते हैं और वक्त पर पहुंचने को बुरा समझा जाता है।

रियो के लोग सबसे लेट यदि कोई पार्टी के लिए किसी को निमंत्रण देता है तो लोग डेढ़ से दो घंटे बाद ही जाते हैं। कोई गलती से वक्त पर पहुंच गया तो उसे न तो मेजबान तैयार मिलता है और न ही उसे कोई तवज्जो देता है। इस मामले में वो किसी तरह की माफी भी नहीं मांगता है।

पूरे ब्राजील में राजधानी रियो के लोग सबसे ज्यादा लेट होते हैं। दक्षिणी ब्राजील की टेक्नोलॉजिकल फेडरल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. जैक्लीन बोनडोनाडा कहती हैं कि ब्राजील के लोगों का मोटो है, 'लाइफ इज ए बीच', यानी जिंदगी एक ठहराव है।

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इस सोच में तब और इजाफा हो जाता है, जब आप रोजमर्रा की जिंदगी ट्रैफिक जाम से जूझते हुए बिताते हैं। नतीजा यह है कि रियो के लोग न तो खुद वक्त के पाबंद होते हैं, न ही वो दूसरों को वक्त पर पहुंचना अच्छा मानते हैं। इसलिए मेजबान भी अगर लेटलतीफ है, तो उसे इसकी इजाजत है।

अलग-अलग काम में देरी का वक्त तय...

पार्टी या अन्य इवेंट - डेढ़ से दो घंटे

कारोबारी मीटिंग - आधा घंटे

भाषा में 'टाइम पर पहुंचने' का शब्द ही नहीं

मूल रूप से ब्रिटेन की रहने वाली फियोना रॉय ब्राजील में अनुवादक का काम करती हैं। लेटलतीफी पुर्तगाली भाषा के शब्दों में भी झलकती है। वहां ज्यादा वक्त लगने या देर होने से जुड़े शब्द तो हैं, लेकिन टाइम पर पहुंचने का शब्द ही नहीं है। ऐसे में जो लोग वक्त से पहुंच जाते हैं तो उन्हें 'होरा इंग्लिशिया' यानी अंग्रेजों की तरह वक्त का पाबंद कहा जाता है।

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